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घर की याद

सावन, संदेश दे आना

कविता के अंतिम भाग का भाव और शिल्प समझाना।

माँ का धीरज. कवि सोचता है: माँ ने भी कितना दुख सहा होगा, फिर भी पिता से कहा होगा: 'आँख में किस लिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी'।

  • वह अपने मन और अपनेपन (देश के प्रति) को समझकर गया है, तो ठीक ही है; 'यह तुम्हारी लीक ही है': यही तुम्हारे परिवार की परंपरा है।
  • जो पाँव पीछे हटाता, वह मेरी कोख को लजाता।
  • 'इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेंगे और बच्चे': तुम ऐसे कमज़ोर मत बनो, वरना बच्चे भी रो पड़ेंगे।

पिता का छिपा दुख. और पिता ने कहा होगा: 'कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ, धीर मैं खोता, कहाँ हूँ': आँसू छिपाकर भी हिम्मत दिखाते हुए।

सावन, संदेशवाहक. कवि सावन को पुकारता है: 'हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन'। प्रकृति को संदेशवाहक बनाना कविता की पुरानी परंपरा है।

'बस' के दो अर्थ. 'मैं मज़े में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है, किंतु यह बस बड़ा बस है, इसी बस से सब विरस है':

  • पहला 'बस' = केवल (बस इतनी-सी बात है कि घर नहीं हूँ)।
  • फिर 'यह बस बड़ा बस है': यह 'केवल' छोटी बात नहीं, बहुत बड़ी बात है; इसी से सब विरस (फीका, बेस्वाद) है।
  • एक ही छोटे शब्द से कवि का छिपा दुख झलक जाता है।

क्या कहना है. सावन से कवि कहता है: उनसे यह न कहना। उन्हें धीरज देते रहना; कहना कि मैं लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, काम कर रहा हूँ, नाम कर रहा हूँ; कहना कि मैं मस्त हूँ, कातने में व्यस्त हूँ, मेरा वज़न सत्तर सेर है, भोजन ढेर है, कूदता-खेलता हूँ, दुख डटकर ठेलता हूँ।

क्या नहीं कहना. 'यों न कहना अस्त हूँ मैं': यह मत कहना कि मैं टूट गया हूँ।

  • 'कह न देना जागता हूँ': कि रात भर जागता हूँ;
  • 'आदमी से भागता हूँ': कि लोगों से कटा-कटा रहता हूँ;
  • 'कह न देना मौन हूँ मैं, खुद न समझूँ कौन हूँ मैं': कि चुप रहता हूँ, ख़ुद को भी नहीं समझ पाता।
  • 'देखना कुछ बक न देना, उन्हें कोई शक न देना'।

शिल्प. दो-दो पंक्तियों की तुक (गिर रहा / तिर रहा, भाई / आई, कहना / रहना), पुनरुक्ति ('बहुत पानी गिर रहा है' बार-बार), बोलचाल की सहज भाषा, और प्रकृति (सावन) का मानवीकरण।

नया उदाहरण. हॉस्टल में बीमार पड़ा कोई छात्र फ़ोन पर माँ से कहे 'सब बढ़िया है, अच्छा खा रहा हूँ, पढ़ाई भी ठीक चल रही है', और फ़ोन रखते ही चुपचाप लेट जाए: अपनों को चिंता से बचाने के लिए अपना दुख छिपाना।

अपना दुख छिपाकर दूसरों को धीरज देना।

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