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चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती

त्रिलोचन: ठेठ गाँव का कवि

कवि और कविता की पृष्ठभूमि समझाना।

कवि. त्रिलोचन (मूल नाम वासुदेव सिंह; सन् 1917-2007) का जन्म सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) ज़िले के चिरानी पट्टी गाँव में हुआ। हिंदी साहित्य में वे प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं।

  • वे बहुभाषाविद् थे (कई भाषाओं के जानकार), इसलिए नाम के साथ 'शास्त्री' भी जुड़ गया; पर यह शास्त्रीयता उनकी कविता पर बोझ नहीं बनती। हिंदी के कई कोशों (शब्दकोश) के निर्माण में भी उनका योगदान है।
  • रचनाएँ: 'धरती', 'गुलाब और बुलबुल', 'दिगंत', 'ताप के ताये हुए दिन', 'उस जनपद का कवि हूँ', 'अरघान', 'मेरा घर' आदि। सम्मान: साहित्य अकादमी, शलाका सम्मान, महात्मा गांधी पुरस्कार (उ.प्र.)।

उनकी कविता. त्रिलोचन 'जीवन में निहित मंद लय' के कवि हैं: तेज़ आवेग नहीं, ठहराव।

  • भाषा छायावादी रूमानियत (सपनीली, भारी भाषा) से मुक्त, और ठेठ गाँव की ज़मीन से जुड़ी है।
  • वे बोलचाल की भाषा को चुटीला और नाटकीय बना देते हैं।
  • हिंदी में सॉनेट (चौदह पंक्तियों का अंग्रेज़ी छंद) को स्थापित करने वाले कवि के रूप में भी वे जाने जाते हैं।

यह कविता. 'चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती' 'धरती' संग्रह से है। यह पलायन (रोज़गार के लिए गाँव छोड़कर शहर जाना) के लोक-अनुभव को मार्मिकता से दिखाती है, और आर्थिक मजबूरियों से टूटते घरों का दारुण यथार्थ सामने रखती है।

नया उदाहरण. किसी गाँव की दादी, जो कभी स्कूल नहीं गईं, पोते का मोबाइल देखकर हैरान हों कि इतनी-सी स्क्रीन पर दूर बैठे बेटे की आवाज़ और चेहरा कैसे आ जाता है: जो चीज़ हमारे लिए साधारण है, वही किसी और के लिए अचरज है।

गाँव की बोली, गहरी बात।

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