चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
नटखट चंपा और 'कागद गोदना'
चंपा का चरित्र और पढ़ाई के प्रति उसका भाव समझाना।
अचरज. 'चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती': चंपा अक्षर नहीं पहचानती (चीन्हती)। कवि जब पढ़ने लगता है, वह आ जाती है और खड़ी-खड़ी चुपचाप सुनती है। उसे बड़ा अचरज होता है: 'इन काले चीन्हों से कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं'।
चंपा कौन है? 'चंपा सुन्दर की लड़की है': सुन्दर एक ग्वाला है, जो गायें-भैंसें रखता है। चंपा चौपायों (चार पैर वाले पशु) को लेकर चरवाही करने जाती है।
चंपा का स्वभाव. कवि बताता है: चंपा अच्छी है, चंचल है, और 'न ट ख ट' भी है (अक्षर अलग-अलग लिखकर उसकी शरारत पर ज़ोर)।
- कभी-कभी ऊधम करती है;
- कभी-कभी कवि की कलम चुरा देती है; कवि जैसे-तैसे कलम ढूँढ़कर लाता है, तो अब काग़ज़ ग़ायब!
'कागद ही गोदा करते हो'. चंपा पूछती है: 'तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर, क्या यह काम बहुत अच्छा है'। उसकी नज़र में लिखना बस काग़ज़ पर लकीरें खींचना (गोदना) है। कवि हँस देता है, और चंपा चुप हो जाती है।
पढ़ने की सलाह. एक दिन कवि कहता है: चंपा, तुम भी पढ़ लो, 'हारे गाढ़े काम सरेगा'; और 'गांधी बाबा की इच्छा है, सब जन पढ़ना-लिखना सीखें'।
भोला तर्क. चंपा का जवाब: 'मैं तो नहीं पढूँगी'; 'तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं, वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे'। उसके लिए पढ़ाई कोई अनजानी, बेकार की चीज़ है, इसलिए वह मान ही नहीं पाती कि कोई अच्छा आदमी उसकी सलाह देगा।
नया उदाहरण. कोई छोटा बच्चा, जिसे सब्ज़ियाँ पसंद नहीं, सुने कि उसके प्रिय क्रिकेट खिलाड़ी रोज़ हरी सब्ज़ी खाने को कहते हैं, और तुरंत बोले 'वो इतने अच्छे हैं, ऐसा कैसे कहेंगे?': अपनी नापसंद को 'अच्छे' लोगों से जोड़ ही नहीं पाता।
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