चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
कलकत्ते पर बजर गिरे
कविता के अंत का भाव और सामाजिक संदेश समझाना।
कवि का दूसरा तर्क. कवि समझाता है: चंपा, पढ़ लेना अच्छा है। ब्याह होगा, तुम गौने जाओगी (ससुराल विदा होगी); बालम (पति) कुछ दिन साथ रहकर कलकत्ता चला जाएगा। 'बड़ी दूर है वह कलकत्ता': तब तुम उसे सँदेसा कैसे दोगी, उसके पत्र कैसे पढ़ोगी?
चंपा का ग़ुस्सा. 'तुम कितने झूठे हो, देखा, हाय राम, तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो'।
चंपा का संकल्प.
- 'मैं तो ब्याह कभी न करूँगी';
- और अगर ब्याह हो ही गया, तो 'मैं अपने बालम को सँग साथ रखूँगी';
- 'कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी';
- 'कलकत्ते पर बजर गिरे।'
'बजर गिरे'. बजर = वज्र (बिजली)। चंपा उस शहर पर बिजली गिरने की कामना करती है जो पतियों को घर से दूर ले जाता है। यह आक्रोश उसके संघर्ष और जीवट (हिम्मत) का प्रतीक है।
सामाजिक सच्चाई. यह पूर्वी प्रदेशों (पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार) की स्त्रियों की विडंबना है:
- रोज़गार के लिए पुरुष दूर के बड़े शहरों में चले जाते हैं (पलायन);
- पत्नी गाँव में अकेली छूट जाती है;
- अशिक्षा के कारण वह चिट्ठी भी न पढ़ पाए, न लिख पाए, तो विवशता और बढ़ जाती है।
- चंपा अनजाने ही उस शोषक व्यवस्था के विरोध में खड़ी हो जाती है जो घर तोड़ती है।
शिल्प. बोलचाल की ग्रामीण भाषा: अच्छर (अक्षर), चीन्हना (पहचानना), कागद (काग़ज़), गोदना, सँदेसा, बालम, बजर। संवाद शैली से कविता नाटक जैसी लगती है, और 'चंपा पढ़ लेना अच्छा है' की आवृत्ति उसे लय देती है।
नया उदाहरण. किसी गाँव के बच्चे के पिता हर साल काम के लिए दूर शहर चले जाएँ; बच्चा कहे 'वह शहर ही न होता तो अच्छा था, जो पापा को ले जाता है': बच्चे का ग़ुस्सा शहर पर है, पर असल में वह उस मजबूरी पर है जो परिवार को अलग करती है।
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