गज़ल
दुष्यंत कुमार और हिंदी गज़ल
कवि और गज़ल विधा का परिचय देना।
कवि. दुष्यंत कुमार (सन् 1933-1975) का जन्म उत्तर प्रदेश के राजपुर नवादा गाँव में हुआ। उनका साहित्यिक जीवन इलाहाबाद में शुरू हुआ, जहाँ वे 'परिमल' संस्था की गोष्ठियों और 'नए पत्ते' पत्र से जुड़े रहे। रोज़ी के लिए आकाशवाणी, फिर मध्य प्रदेश के राजभाषा विभाग में काम किया। अल्पायु में निधन हुआ, पर उपलब्धियाँ छोटी नहीं।
- रचनाएँ: 'सूर्य का स्वागत', 'आवाज़ों के घेरे', 'साये में धूप', 'जलते हुए वन का वसंत' (काव्य); 'एक कंठ विषपायी' (बहुप्रशंसित गीति-नाट्य); 'छोटे-छोटे सवाल', 'आँगन में एक वृक्ष', 'दोहरी ज़िंदगी' (उपन्यास)।
- गज़ल को हिंदी में प्रतिष्ठित करने का श्रेय अकेले दुष्यंत को जाता है। उनके कई शेर सभाओं में लोकोक्तियों (कहावतों) की तरह दोहराए जाते हैं।
गज़ल क्या है? गज़ल शेरों से बनती है; शेर = दो पंक्तियों की एक इकाई।
- हर शेर अपने-आप में पूरा (मुकम्मिल) और स्वतंत्र होता है; उन्हें किसी क्रम में पढ़ना ज़रूरी नहीं।
- गज़लों में शीर्षक देने का चलन नहीं; इसीलिए पाठ में भी कोई शीर्षक नहीं है।
शेरों को क्या बाँधता है? दो चीज़ें:
- रूप के स्तर पर: तुक का निर्वाह। पहले शेर की दोनों पंक्तियों की तुक मिलती है, और उसके बाद हर शेर की दूसरी पंक्ति में वही तुक चलती है।
- अंतर्वस्तु के स्तर पर: मिज़ाज (मनोदशा) का निर्वाह।
इस गज़ल का सूत्र. आम तौर पर गज़ल के शेरों में एक केंद्रीय भाव ज़रूरी नहीं, पर यह पूरी गज़ल एक ख़ास मनःस्थिति में लिखी लगती है: राजनीति और समाज में जो चल रहा है उसे खारिज करना, और विकल्प की तलाश। यह गज़ल 'साये में धूप' संग्रह से है।
नया उदाहरण. किसी गीत में हर अंतरा अलग कहानी कहे (एक माँ पर, एक दोस्त पर, एक गाँव पर), पर हर अंतरे के बाद वही मुखड़ा लौटे: अंतरे स्वतंत्र, मुखड़ा उन्हें जोड़ता है। गज़ल में यही काम तुक और मिज़ाज करते हैं।
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