अक्कमहादेवी — दो वचन
हे भूख! मत मचल
पहले वचन का भाव समझाना।
पहला वचन. इसमें इंद्रियों और मन के विकारों पर नियंत्रण का संदेश है। अक्क एक-एक को पुकारकर बात करती हैं:
- 'हे भूख! मत मचल': भूख, ज़िद मत कर;
- 'प्यास, तड़प मत';
- 'हे नींद! मत सता';
- 'क्रोध, मचा मत उथल-पुथल';
- 'हे मोह! पाश अपने ढील': मोह, अपने पाश (बंधन, फंदा) ढीले कर;
- 'लोभ, मत ललचा';
- 'हे मद! मत कर मदहोश': मद (घमंड, नशा), बेसुध मत कर;
- 'ईर्ष्या, जला मत'।
मनुहार. हर पंक्ति में 'मत' है, पर स्वर कठोर नहीं। अक्क इन्हें दुश्मन की तरह डाँटतीं नहीं; जैसे किसी अपने से प्यार से कहती हों। पुस्तक इसे 'प्रेम-भरा मनुहार' कहती है।
'ओ चराचर! मत चूक अवसर'. चराचर = चर (चलने वाले, जीव) + अचर (न चलने वाले, जड़): यानी सारा संसार। अक्क पूरे जगत से कहती हैं: यह अवसर मत चूको।
क्यों? 'आई हूँ संदेश लेकर चन्नमल्लिकार्जुन का': वे शिव का संदेश लेकर आई हैं। यह ईश्वर से जुड़ने का अवसर है; भूख, नींद, क्रोध, मोह जैसे भाव इस रास्ते में बाधा न बनें।
शिल्प. संबोधन शैली (हे भूख!, हे नींद!, ओ चराचर!), इंद्रियों और भावों का मानवीकरण (भूख मचलती है, मोह के पाश हैं, ईर्ष्या जलाती है), छोटी-छोटी सरल पंक्तियाँ।
नया उदाहरण. परीक्षा से पहले की रात कोई छात्र अपने आप से कहे: 'ऐ नींद, थोड़ी देर रुक जा; ऐ फ़ोन, आज मत बुला; ऐ आलस, आज छुट्टी ले': वह इन्हें डाँट नहीं रहा, मना रहा है, क्योंकि कल का मौका बड़ा है।
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