अक्कमहादेवी — दो वचन
हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर
दूसरे वचन का भाव और प्रतीक समझाना।
दूसरा वचन. यह एक भक्त का ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है। अक्क हर भौतिक वस्तु से अपनी झोली ख़ाली रखना चाहती हैं, ताकि उसमें केवल ईश्वर की अनुकंपा (कृपा) रहे।
'हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर'. ईश्वर की तुलना जूही के फूल से की गई है: उजला (पवित्र), कोमल और सुगंधित। 'चन्नमल्लिकार्जुन' नाम में भी मल्लिका (चमेली जैसा सफ़ेद फूल) छिपा है।
कामनाएँ. अक्क ईश्वर से कहती हैं:
- 'मँगवाओ मुझसे भीख': मुझसे भीख मँगवाओ;
- 'कि भूल जाऊँ अपना घर पूरी तरह': अपना घर पूरी तरह भूल जाऊँ;
- 'झोली फैलाऊँ और न मिले भीख';
- कोई कुछ देने को हाथ बढ़ाए, तो वह नीचे गिर जाए;
- और मैं उसे उठाने झुकूँ, तो कोई कुत्ता आकर उसे झपटकर छीन ले।
निस्पृह अवस्था. निस्पृह = जिसे किसी चीज़ की चाह न हो। राजमहल का वैभव छोड़ चुकी अक्क अब भीख तक का सहारा नहीं चाहतीं। वे चाहती हैं कि उनका 'स्व' (मैं) और अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाए, और केवल ईश्वर बचे।
कन्नड़ की मीरा? अक्क की तुलना मीरा से होती है: दोनों ने ईश्वर को ही अपना सब कुछ माना; दोनों ने राजसी वैभव और कुल-मर्यादा के बंधन छोड़े; दोनों ने समाज की परवाह न करके अपने विश्वास पर चलीं।
नया उदाहरण. कोई बड़ा खिलाड़ी सन्यास लेकर गाँव में बच्चों को मुफ़्त सिखाने लगे; न कोई सम्मान माँगे, न तस्वीर छपवाए, न अपना नाम बताए: जब 'मैं' का भाव मिट जाए, तभी सेवा पूरी होती है।
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