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आओ, मिलकर बचाएँ

क्या-क्या बचाना है

कविता की सूची और उसके अर्थ समझाना।

बस्तियों को बचाना. 'अपनी बस्तियों को / नंगी होने से / शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे': शहर की आबो-हवा (रहन-सहन, दिखावा, लालच) बस्ती की अपनी पहचान, संस्कृति और पेड़-पौधों को छीनकर उसे 'नंगा' (ख़ाली, उजड़ा) कर रही है।

  • 'बचाएँ डूबने से / पूरी की पूरी बस्ती को / हड़िया में': हड़िया चावल से बनने वाला एक नशीला पेय है। कवयित्री चाहती हैं कि पूरी बस्ती नशे की लत में न डूबे।

अपनी पहचान.

  • 'अपने चेहरे पर सन्थाल परगना की माटी का रंग': अपने इलाक़े और जड़ों की पहचान;
  • 'भाषा में झारखंडीपन': अपनी बोली का स्वाद और लहजा।

मन के गुण.

  • 'ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट': रोज़ के नीरस होते जीवन में उमंग;
  • 'मन का हरापन': मन की ताज़गी;
  • 'भोलापन दिल का';
  • और साथ ही 'अक्खड़पन, जुझारूपन भी': अकड़ (स्वाभिमान) और संघर्ष करने का गुण। केवल भोलापन हो तो लोग ठगे जाते हैं; उसके साथ जुझारूपन भी चाहिए।

संघर्ष की शक्ति. 'भीतर की आग' (हिम्मत, जोश), 'धनुष की डोरी', 'तीर का नुकीलापन', 'कुल्हाड़ी की धार': ये आदिवासी जीवन के जाने-पहचाने औज़ार हैं, जिन्हें कवयित्री प्रतीक की तरह रखती हैं।

प्रकृति और लोक-जीवन. 'जंगल की ताज़ा हवा', 'नदियों की निर्मलता', 'पहाड़ों का मौन', 'गीतों की धुन', 'मिट्टी का सोंधापन' (बारिश की पहली बूँदों पर उठने वाली मिट्टी की ख़ुशबू), 'फसलों की लहलहाहट'।

नया उदाहरण. कोई परिवार शहर में आकर भी घर में अपनी बोली बोले, त्योहार पर अपने गाँव के गीत गाए, और बच्चों को दादी के पकवान बनाना सिखाए: नई जगह अपनाते हुए अपनी जड़ें बचाना।

भोलापन भी, जुझारूपन भी।

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