विदाई-संभाषण
बालमुकुंद गुप्त और विदाई का व्यंग्य
लेखक, उनकी शैली और पाठ की शुरुआत समझाना।
लेखक. बालमुकुंद गुप्त (सन् 1865-1907) का जन्म गुड़ियानी, ज़िला रोहतक (हरियाणा) में हुआ। आरंभिक शिक्षा उर्दू में हुई, हिंदी बाद में सीखी; पढ़ाई मिडिल तक हुई, पर स्वाध्याय से बहुत ज्ञान पाया।
- वे राष्ट्रीय नवजागरण के सक्रिय पत्रकार थे; पत्रकारिता उनके लिए स्वाधीनता-संग्राम का हथियार थी। उन्होंने 'अखबार-ए-चुनार', 'हिंदुस्तान', 'हिंदी बंगवासी', 'भारतमित्र' का संपादन किया।
- उन्हें भारतेंदु-युग और द्विवेदी-युग के बीच की कड़ी माना जाता है। वे शब्दों के पारखी थे: 'अनस्थिरता' शब्द की शुद्धता पर उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी से लंबी बहस की।
- उनके लेखन में निर्भीकता और व्यंग्य-विनोद, दोनों हैं।
यह पाठ. 'विदाई-संभाषण' उनकी सबसे चर्चित व्यंग्य रचना 'शिवशंभु के चिट्ठे' का अंश है। इसमें 'शिवशंभु' नाम का एक भोला, दीन ब्राह्मण वायसराय लॉर्ड कर्ज़न (1899-1904 और 1904-1905, दो बार वायसराय) की विदाई पर उनसे बात करता है।
- कर्ज़न सरकारी निरंकुशता के पक्षधर थे; उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता तक पर प्रतिबंध लगाया। यह पाठ उसी पाबंदी के दौर में लिखा गया, इसलिए यह साहसिक गद्य का नमूना है।
तीसरी शक्ति. पाठ शुरू होता है: संसार में सब बातों का अंत है। कर्ज़न ने ख़ुद को 'चिरस्थायी' वायसराय सोचा था, पर समय इतनी जल्दी पूरा हो गया। इसलिए लेखक कहता है कि कर्ज़न और भारतवासियों के बीच कोई तीसरी शक्ति भी है, जिस पर किसी का काबू नहीं: वह नियति जो 'परदे के पीछे' अपना खेल खेलती है।
दो गायें. शिवशंभु की दो गायें थीं; बलवान गाय कमज़ोर को सींग मारकर गिरा देती थी। जब बलवान गाय पुरोहित को दे दी गई, तो कमज़ोर गाय ख़ुश नहीं हुई; उस दिन उसने चारा तक नहीं छुआ। लेखक कहता है: जिस देश के पशु भी बिछड़ने पर उदास होते हैं, वहाँ के मनुष्यों का क्या हाल होगा।
नया उदाहरण. कोई कर्मचारी सख़्त, चिड़चिड़े मैनेजर की विदाई पर मुस्कुराकर कहे, 'आपके बिना यह दफ़्तर सचमुच बहुत शांत हो जाएगा': शब्द तारीफ़ के, पर अर्थ उलटा। यही व्यंग्य है।
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