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विदाई-संभाषण

नरवरगढ़ की विदाई और पाठ की भाषा

आदर्श विदाई और पाठ की भाषा समझाना।

नर सुलतान का गीत. लेखक कहता है कि जिस 'अनपढ़-गूँगी' प्रजा का नाम कर्ज़न कभी-कभी लेते हैं, उसी में नर सुलतान नाम के राजकुमार का गीत गाया जाता है। उसने विपदा के कई साल नरवरगढ़ में काटे थे, चौकीदारी से लेकर ऊँचे पद तक काम किया।

  • विदा होते समय वह घोड़े पर नगर-द्वार के बाहर आया और आँखों में आँसू भरकर बोला: 'प्यारे नरवरगढ़! मेरा प्रणाम ले।' तू मेरा अन्नदाता है; तेरा ऋण मैं नहीं चुका सकता।
  • यदि मैंने जानबूझकर सेवा में चूक की हो, प्रजा की शुभ चिंता न की हो, यहाँ की स्त्रियों को माता और बहन की दृष्टि से न देखा हो, तो मेरा प्रणाम न ले; नहीं तो प्रसन्न होकर प्रणाम ले और जाने की आज्ञा दे।

कर्ज़न से सवाल. क्या कर्ज़न भी जाते समय कह सकेंगे: 'अभागे भारत! मैंने तुझसे सब प्रकार का लाभ उठाया... पर मैंने तेरे बिगाड़ने में कुछ कमी न की... आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे'? लेखक कहता है कि यह देश उनकी पिछली सब बातें भूल सकता है, 'पर इतनी उदारता माइ लॉर्ड में कहाँ?' यही पाठ का अंतिम व्यंग्य है।

भाषा: भारतेंदु-युगीन प्रयोग. उस समय की हिंदी के कुछ पुराने रूप:

  • 'अंत को' (आख़िरकार), 'जावेगा' (जाएगा), 'आवें' (आएँ), 'आप किस को आए थे' (किस काम से आए थे), 'रखाया' (रखवाया)।
  • 'पधारें' आम तौर पर आने के लिए होता है, पर यहाँ व्यंग्य में चले जाने के अर्थ में आया है।

शब्द. करुणोत्पादक (करुणा जगाने वाला), विषाद (दुख), सूत्रधार (बागडोर सँभालने वाला), पटखनी (चित्त कर देना), तिलांजलि (त्याग देना), पायमाल (नष्ट), आरह (आरा), अदना (छोटा-सा), विच्छेद (टूटना), ताब (सामर्थ्य)।

नया उदाहरण. 'वह तीन बजे पधारेगा' का सामान्य अर्थ है 'वह आएगा'; पर अगर कोई किसी झगड़ालू मेहमान के बारे में कहे 'भगवान करे, वे जल्दी पधारें', तो अर्थ उलटा है: 'जल्दी चले जाएँ'।

जाने वाला अपने काम से याद किया जाता है।

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