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गलता लोहा

शेखर जोशी और कहानी का आरंभ

लेखक और कहानी की शुरुआत समझाना।

लेखक. शेखर जोशी (सन् 1932-2022) का जन्म अल्मोड़ा (आज उत्तराखंड) में हुआ। 1950 के दशक के 'नई कहानी आंदोलन' में वे प्रगतिशील पक्ष के प्रमुख कहानीकार हैं।

  • उनकी कहानियों में समाज का मेहनतकश और सुविधाहीन तबका है; भाषा सहज और आडंबरहीन।
  • रचनाएँ: 'कोसी का घटवार', 'साथ के लोग', 'दाज्यू', 'हलवाहा', 'नौरंगी बीमार है'; शब्दचित्र 'एक पेड़ की याद'। 'दाज्यू' पर चिल्ड्रंस फ़िल्म सोसाइटी ने फ़िल्म बनाई। उन्हें पहल सम्मान मिला।

यह कहानी. 'गलता लोहा' जातिगत विभाजन पर कई कोणों से टिप्पणी करती है, पर लेखक कहीं भाषण नहीं देता। एक मेधावी, पर निर्धन ब्राह्मण युवक मोहन हालात से गुज़रकर वहाँ पहुँचता है जहाँ जातीय अभिमान बेमानी हो जाता है। जाति के झूठे भाईचारे की जगह मेहनतकशों का सच्चा भाईचारा।

शुरुआत. बूढ़े वंशीधर (तिवारी) ने जन्म भर पुरोहिताई से घर चलाया, पर अब जर्जर शरीर व्रत-उपवास और कठिन श्रम नहीं झेलता। उन्हें गणनाथ जाकर चंद्रदत्त जी के लिए रुद्रीपाठ करना है, पर दो मील की सीधी चढ़ाई अब उनके 'बूते' की नहीं। मोहन बात समझता है, पर न उसे ऐसे अनुष्ठान का अभ्यास है, न रुचि; वह कुछ नहीं कहता।

धनराम का आफर. मोहन खेतों की काँटेदार झाड़ियाँ काटने हँसुवा लेकर निकलता है, पर उसकी धार कुंद है। पैर अपने-आप शिल्पकार टोले में धनराम लोहार के आफर (भट्ठी, कार्यशाला) की ओर मुड़ जाते हैं।

  • लोहार के औज़ार: निहाई (लोहे का ठोस टुकड़ा जिस पर रखकर पीटते हैं), धौंकनी (आग दहकाने की नली), हथौड़ा, सँड़सी (गरम लोहा पकड़ने का चिमटा), दराँती।
  • मोहन एक खाली कनिस्तर पर बैठकर धनराम की कारीगरी पारखी नज़र से देखता है, और दोनों बचपन की बातों में लौट जाते हैं।

नया उदाहरण. किसी पुराने मोहल्ले में दो पुराने सहपाठी बरसों बाद मिलें: एक अब मोची की दुकान चलाता है, दूसरा जूते सिलवाने आया है; बात जूते से शुरू हो और स्कूल के दिनों तक पहुँच जाए।

लोहा तपकर ही नया आकार लेता है।

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