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गलता लोहा

मास्टर त्रिलोक सिंह की पाठशाला

स्कूल के प्रसंग और जातिगत हीनता समझाना।

मास्टर त्रिलोक सिंह. मास्साब बहुत कड़े थे; उनके आते ही बच्चों को जैसे 'साँप सूँघ' जाता। धनराम कहता है: वे पिछले साल गुज़रे, पर आख़िरी दम तक उनकी छड़ी का डर लगा रहा।

मोहन, चहेता शिष्य. पुरोहित खानदान का कुशाग्र बुद्धि बालक, पढ़ने और गायन में बेजोड़। मास्टर ने उसे पूरे स्कूल का मॉनीटर बनाया; वही 'हे प्रभो आनंददाता!' प्रार्थना का पहला स्वर उठाता। जिस बच्चे को सवाल न आता, उसे सज़ा दिलवाने का काम भी मास्टर मोहन को ही देते।

धनराम का मन. धनराम ने कई बार मोहन के हाथों सज़ा पाई, फिर भी वह मोहन के प्रति स्नेह और आदर रखता था। उसने मोहन को कभी प्रतिद्वंद्वी नहीं माना: बचपन से मन में बैठा दी गई जातिगत हीनता के कारण वह इसे मोहन का अधिकार ही समझता रहा।

तेरह का पहाड़ा. धनराम, गाँव के दूसरे खेतिहर-मज़दूर परिवारों के लड़कों की तरह, बस तीसरे दर्जे तक स्कूल जा सका। बारह तक का पहाड़ा याद था, पर तेरह का पहाड़ा उसके लिए 'पहाड़' हो गया। ग़लती पर मास्टर ने संटी मारी, और उनका नियम था कि सज़ा पाने वाला अपनी संटी ख़ुद लाए।

ज़बान का चाबुक. छुट्टी के समय भी पहाड़ा नहीं आया तो मास्टर ने शब्दों से चोट की: 'तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?' और उसे दराँतियाँ धार लगवाने भेज दिया। लेखक इसे 'ज़बान का चाबुक' कहता है: छड़ी का घाव भर जाता है, शब्दों का नहीं।

दो विद्याएँ. किताबों की विद्या का ताप लगाने की सामर्थ्य धनराम के पिता गंगाराम की नहीं थी। उन्होंने उसे धौंकनी फूँकना, सान लगाना, फिर हथौड़े से घन चलाने की विद्या सिखाई। गंगाराम के बाद धनराम ने विरासत सँभाल ली, और लोग कब 'गंगाराम का आफर' को 'धनराम का आफर' कहने लगे, किसी को याद नहीं।

नया उदाहरण. अगर कोई शिक्षक कक्षा में किसी बच्चे से कहे 'तुमसे तो कुछ नहीं होगा', तो वह बच्चा पढ़ाई से ही मुँह मोड़ सकता है: कहे गए शब्द किसी का पूरा रास्ता बदल सकते हैं।

शब्द भी चाबुक बन सकते हैं।

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