गलता लोहा
गलता लोहा: सर्जक की चमक
कहानी का अंत, उसका संदेश और भाषा समझाना।
धार और ठहराव. धनराम ने हँसुवे को भट्ठी में तपाकर मन लगाकर उसकी धार गढ़ दी, और लौटाते हुए जैसे माफ़ी माँगी: पंडित जी किसी के हाथ भिजवा देते तो मैं तुरंत बना देता। पर मोहन हँसुवा लेकर भी वहीं बैठा रहा, जैसे उसे लौटने की कोई जल्दी न हो।
गाँव की मर्यादा. ब्राह्मण टोले के लोग शिल्पकार टोले में उठते-बैठते नहीं थे; काम हो तो खड़े-खड़े बात निपटा लेते। उन्हें बैठने को कहना भी मर्यादा के विरुद्ध समझा जाता। धनराम मोहन के व्यवहार से असमंजस में है, पर कुछ कहता नहीं।
गलता लोहा. धनराम एक मोटी छड़ को भट्ठी में गलाकर गोलाई में मोड़ रहा था, पर सिरा निहाई पर ठीक न फँसने से लोहा मुड़ नहीं रहा था।
- मोहन ने संकोच त्यागकर लोहे को स्थिर किया, धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट मारी, धौंकनी फूँककर लोहा दोबारा गरम किया, और ठोक-पीटकर सुघड़ गोला बना दिया।
- धनराम अवाक् रह गया और शंकित नज़र से इधर-उधर देखने लगा।
सर्जक की चमक. मोहन संतुष्ट भाव से छल्ले की त्रुटिहीन गोलाई जाँच रहा था, और धनराम की ओर स्वीकृति की मुद्रा में देख रहा था। 'उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी: जिसमें न स्पर्धा थी और न ही किसी प्रकार की हार-जीत का भाव।' यानी श्रम और हुनर का निर्मल आनंद। लेखक कोई उपदेश नहीं देता; कहानी इसी दृश्य पर ख़त्म होती है।
भाषा. संयुक्त क्रियाएँ: काट-छाँटकर, उलट-पलट, ठोकते-पीटते, खा-पीकर, पढ़-लिखकर। 'बूते' (शक्ति, सामर्थ्य, सहारा) तीन बार आता है। पहाड़ी बोली के रंग: लला, मास्साब, धनुवाँ, 'तेरै दूणी'।
नया उदाहरण. किसी शादी में बड़े घर का बेटा देखे कि रसोइए की कड़ाही का हत्था टूट रहा है, और बिना कुछ सोचे आस्तीन चढ़ाकर उसकी मदद करे; काम पूरा होने पर दोनों बस मुस्कुरा दें: वहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं, बस काम का आनंद।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.