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कबीर — हम तौ एक एक करि जांनां

पद: एक ईश्वर, एक तत्व

पद का अर्थ और कबीर के तर्क समझाना।

पद का स्रोत. यह पद जयदेव सिंह और वासुदेव सिंह द्वारा संपादित 'कबीर वाङ्मय' (खंड 2, सबद) से लिया गया है। इसमें कबीर परमात्मा को सृष्टि के कण-कण में, ज्योति के रूप में देखते हैं: अद्वैत (एक ही सत्ता) का भाव।

'हम तौ एक एक करि जांनां'. कबीर कहते हैं: हमने तो ईश्वर को एक ही जाना है। 'दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग': जो उसे दो (अलग-अलग) कहते हैं, उनके लिए दोज़ख (नरक) है; उन्होंने उसे पहचाना ही नहीं।

एक पवन, एक पानी. 'एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समांनां': संसार में एक ही हवा बहती है, एक ही पानी है, और एक ही ज्योति (परमात्मा) सबमें समाई है। हवा-पानी किसी जाति या धर्म को देखकर नहीं बँटते।

कुम्हार और बर्तन. 'एकै खाक गढ़े सब भांडै़ एकै कोंहरा सांनां': एक ही कुम्हार (कोंहरा) ने एक ही मिट्टी (खाक) सानकर सारे बर्तन (भांडे) गढ़े हैं।

बढ़ई और आग. 'जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई': बढ़ई (बाढ़ी) लकड़ी (काष्ट) तो काट सकता है, पर लकड़ी के भीतर छिपी आग को कोई नहीं काट सकता। 'सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई': वैसे ही हर शरीर (घट) के भीतर तू ही व्याप्त है, और वही अलग-अलग रूप धारण करता है। शरीर नष्ट होता है, भीतर का परमात्मा अविनाशी है।

शब्द. दोजग (दोज़ख, नरक), खाक (मिट्टी), भांडे (बर्तन), कोंहरा (कुम्हार), सांनां (साना, गूँधा), बाढ़ी (बढ़ई), काष्ट (लकड़ी), घटि (घट, शरीर), अंतरि (भीतर)।

नया उदाहरण. एक ही सोने से कोई कंगन बनवाए, कोई अँगूठी, कोई हार; नाम और आकार अलग हैं, पर पिघलाओ तो सब फिर वही सोना। रूप अनेक, धातु एक।

रूप अनेक, तत्व एक।

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