कबीर — हम तौ एक एक करि जांनां
माया, निर्भयता और कबीर का दीवानापन
पद के अंत का भाव और संत परंपरा समझाना।
माया का आकर्षण. 'माया देखि के जगत लुभांनां': संसार माया (धन, रूप, पद, चमक-दमक) देखकर लुभा जाता है, और भूल जाता है कि सबमें एक ही ज्योति है।
घमंड क्यों? 'काहे रे नर गरबांनां': हे मनुष्य, तू किस बात का घमंड (गर्व) करता है? जब सब एक ही मिट्टी के बर्तन हैं, तो कोई ऊँचा-नीचा कैसे?
निर्भयता. 'निरभै भया कछू नहिं ब्यापै': जो ईश्वर की एकता को जान लेता है, वह निर्भय हो जाता है।
'कहै कबीर दिवांनां'. कबीर स्वयं को दीवाना कहते हैं। संसार की नज़र में जो व्यक्ति माया के पीछे नहीं भागता, घमंड नहीं करता, वह 'पागल' लगता है। पर यह दीवानापन ईश्वर-प्रेम की मस्ती है।
संत परंपरा. कबीर की तरह नानक, दादू, रैदास जैसे संत भी ईश्वर को एक, निर्गुण और भीतर बसने वाला मानते थे।
- कबीर के पद शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत, दोनों में गाए जाते हैं: कुमार गंधर्व, भारती बंधु और प्रह्लाद सिंह टिपाणिया जैसे गायकों ने इन्हें गाया है।
शिल्प. पद सधुक्कड़ी भाषा में है (कई बोलियों का मेल): जांनां, पहिचांनां, समांनां, सांनां, लुभांनां, गरबांनां, दिवांनां, हर पंक्ति के अंत में '-आंनां' की तुक, जो गाने में लय देती है। उदाहरण (कुम्हार, बढ़ई) से गहरी बात सरल बन जाती है।
नया उदाहरण. कोई डॉक्टर बड़ा पैसा छोड़कर गाँव में मुफ़्त इलाज करने लगे; रिश्तेदार कहें 'पागल हो गया है', पर वह हर सुबह ख़ुशी से काम पर निकले: दुनिया जिसे पागलपन कहे, वही किसी के लिए सच्ची मस्ती हो सकती है।
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