दो बैलों की कथा
हीरा-मोती और झूरी
प्रेमचंद की कहानी का पहला भाग पढ़िए और हीरा-मोती तथा झूरी से मिलिए।
लेखक. प्रेमचंद (1880–1936) का असली नाम धनपत राय था। उनकी कहानियाँ 'मानसरोवर' के आठ भागों में छपी हैं, और 'गोदान', 'गबन', 'निर्मला' उनके मशहूर उपन्यास हैं। यह कहानी दो बैलों की है, पर इसके भीतर एक बड़ी बात छिपी है: आज़ादी आसानी से नहीं मिलती, उसके लिए बार-बार लड़ना पड़ता है।
शुरुआत गधे से. सोचिए, क्या आपने कभी गधे को गुस्सा होते देखा है? गाय भी कभी सींग मार देती है, कुत्ता भी कभी भौंक देता है, पर गधा सब कुछ चुपचाप सह लेता है। फिर भी लोग उसे मूर्ख कहते हैं। लेखक इस पर व्यंग्य करते हैं (यानी हँसी-हँसी में चोट करते हैं): दुनिया सीधेपन की कद्र नहीं करती। वे लिखते हैं कि मेहनती, सीधे-सादे भारतीयों की अफ्रीका में भी ऐसी ही दुर्दशा होती है। और बैल को वे गधे का 'छोटा भाई' कहते हैं।
हीरा और मोती. झूरी के पास पछाईं (पश्चिम की ओर की) नस्ल के दो सुंदर, मेहनती बैल थे: हीरा और मोती। दोनों बिना बोले, आँखों और इशारों की मूक भाषा में एक-दूसरे की बात समझ लेते। साथ खाते, साथ बैठते, और गाड़ी में जुतते तो हर एक चाहता कि बोझ उसकी अपनी गरदन पर ज़्यादा पड़े।
गया के घर. एक दिन झूरी ने दोनों को अपने साले गया के घर भेज दिया। बैलों को लगा कि मालिक ने उन्हें बेच दिया है। नया घर, नए लोग, सब पराए लगे। उन्होंने नाँद (चारे का बड़ा बर्तन) में मुँह तक नहीं डाला। रात होते ही ज़ोर लगाकर अपनी मोटी रस्सियाँ तोड़ीं और भागकर झूरी के घर पहुँच गए। सुबह झूरी ने उन्हें चरनी (चारा खाने की जगह) पर खड़ा पाया।
दो तरह का स्वागत. झूरी ने दोनों को गले लगा लिया, और गाँव के लड़कों ने तालियाँ बजाईं। पर झूरी की पत्नी खुश नहीं हुई। उसने बैलों को 'नमक-हराम' (एहसान न मानने वाला) कहा और नौकर से कहलवा दिया कि इन्हें बस सूखा भूसा दिया जाए।
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