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घर की याद

भवानीप्रसाद मिश्र और जेल की बरसात

भवानीप्रसाद मिश्र के बारे में जानिए और जेल की बरसात वाली कविता का आरंभ पढ़िए।

कवि. भवानीप्रसाद मिश्र (1913–1985) का जन्म होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम), मध्य प्रदेश में हुआ। वे कवि भी थे और आज़ादी की लड़ाई के सक्रिय सिपाही भी। उनके कविता-संग्रहों में 'गीत-फ़रोश', 'बुनी हुई रस्सी' और 'गांधी-पंचशती' प्रसिद्ध हैं; 'बुनी हुई रस्सी' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्होंने 'कल्पना' पत्रिका (हैदराबाद) का संपादन किया, आकाशवाणी में काम किया, और 'संपूर्ण गांधी वाङ्मय' का संपादन किया।

कविता कहाँ लिखी गई? 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें तीन साल की जेल हुई। वहीं, जेल में, बरसात की एक रात यह कविता बनी। यह आज़ादी के सिपाहियों के उस दुख की एक झलक है जो जेल की मार से अलग था: घर से दूर होने का दुख, और उनके परिवारों का दुख।

शब्द आसान, भाव गहरे. कविता की भाषा बिल्कुल सरल है; पर हर पंक्ति के पीछे की भावना को पकड़िए। शुरुआत: रात भर बारिश होती रही, और कवि का मन भी उसी तरह घिरता रहा। सुबह कब हुई, ठीक से पता ही न चला, क्योंकि बादलों का अँधेरा अब भी घनेरा (घना, गाढ़ा) था और चारों ओर रात जैसा सन्नाटा था। बाहर का मौसम कवि के भीतर के मन का आईना है।

आवाज़ों से दृश्य. झरा-झर पानी गिरता है, हरा-हर पत्ते हिलते हैं, सर-सर हवा बहती है, और कवि के प्राण थर-थर काँपते हैं (मन की बेचैनी)। तेज़ बारिश के बीच उसकी आँखों के आगे घर तैरने लगता है।

कविता की यात्रा. यह लंबी कविता भावों का एक सफ़र है: उदासी → घर की याद → परिवार की कल्पना → बचपन → पानी थमना और शांति → फिर टीस → सावन के हाथ संदेश। पढ़ते समय पहचानिए कि आप किस पड़ाव पर हैं।

जेल, बरसात, और घर की याद में घिरता मन।

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