घर की याद
चार भाई, चार बहिनें और माँ
कवि के परिवार और उनकी माँ की छवि को समझिए।
भरा-पूरा घर. घर खुशियों से भरा है: चार भाई, चार बहनें; भाई जैसे घर की भुजाएँ (ताकत), बहनें जैसे घर का प्यार। इन दिनों एक बहन मायके आई है।
परिताप का घर. पर इस बार बहन का मायका 'परिताप' (बहुत भारी दुख) का घर है, क्योंकि घर का एक बेटा जेल में है। कवि सोचता है: घर में सब जुड़े हैं, पर इतने कब जुड़े थे! दुख ने सबको और करीब कर दिया है। ऐसे में एक पल भी सौ बरस जैसा लगता है।
माँ. माँ पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर दुखों ने उन्हें गढ़ा है, यानी मज़बूत बनाया है। उनकी गोद में सिर रखो तो कोई दुख नहीं बचता। उनके प्यार की धारा जेल तक पहुँचती है, पर वे लिखना नहीं जानतीं, इसलिए पत्र नहीं भेज सकतीं। कवि को उनका पत्र कभी नहीं मिलता।
माँ की दृढ़ता. जब पिता रो पड़ते हैं, तो माँ उन्हें सँभालती हैं: बेटा तुम्हारी ही राह पर गया है; अगर वह डरकर पीछे हटता, तो मेरी कोख लजाती। ऐसे कच्चे मत बनो, वरना बच्चे और रोएँगे। घर का एक मज़बूत खंभा डगमगाए, तो दूसरा उसे थाम लेता है।
कवि का अपना नाम. कवि खुद को 'पाँचवाँ' (पाँचवाँ बेटा) कहता है, और माँ के मुँह से अपना नाम सुनता है: 'भवानी'।
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