क्या लिखूँ?
लेखक की उलझन
निबंध का पहला भाग पढ़िए और लेखक की उलझन समझिए।
लेखक. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (1894–1971) छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ में जन्मे। वे आलोचक, कवि और खासकर निबंधकार थे, और उन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन किया। यह निबंध आत्मपरक शैली में है: लेखक 'मैं' बनकर सीधे हमसे बात करता है। और ध्यान रखिए, यह निबंध मज़ेदार है; लेखक कई जगह हल्का-सा मज़ाक कर रहा है।
गार्डिनर की बात: हैट और खूँटी. अंग्रेज़ी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर कहते हैं कि कभी-कभी मन में भाव इतने उमड़ते हैं कि लिखना ही पड़ता है, और तब विषय कोई भी चल जाता है। जैसे टोपी (हैट) किसी भी खूँटी पर टाँगी जा सकती है: असली चीज़ टोपी है, खूँटी नहीं। यानी असली चीज़ मन के भाव हैं, विषय तो बस उन्हें टाँगने की जगह है।
लेखक की मुश्किल. बख्शी जी कहते हैं कि उन्हें ऐसी उमड़ती हुई हालत कभी मिली ही नहीं; उन्हें तो सोचना और मेहनत करनी पड़ती है। और आज दो 'आदर्श निबंध' लिखने हैं: नमिता चाहती है 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' पर, और अमिता चाहती है 'समाज-सुधार' पर। मुश्किल यह है कि पहला विषय एक छोटी-सी कहावत है जिसे पाँच पन्नों तक खींचना पड़ेगा, और दूसरा इतना बड़ा है कि उसे पाँच पन्नों में समेटना पड़ेगा।
आचार्यों की सलाह. निबंध सिखाने वाले आचार्य कहते हैं: निबंध छोटा हो; उसके दो मुख्य अंग हैं, सामग्री और शैली; लिखने से पहले रूपरेखा (ढाँचा) बने; भाषा में प्रवाह हो, यानी छोटे पर आपस में जुड़े वाक्य। पर लेखक के पास न पुस्तकालय है, न विश्वकोश, और समय सिर्फ़ दो घंटे।
मीठा मज़ाक. आचार्य यह भी कहते हैं कि विद्वत्ता दिखाने के लिए वाक्य आधा पन्ना लंबे हों और थोड़े कठिन (दुर्बोध) हों। लेखक बाणभट्ट, श्रीहर्ष और सेनापति के नाम लेकर इस पर हँसता है; यह सच्ची सलाह नहीं, व्यंग्य है। आगे वह बताता है कि गार्डिनर को शीर्षक रखने में कठिनाई होती थी, और शेक्सपीयर ने तो एक नाटक का नाम ही 'जैसा तुम चाहो' रख दिया।
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