क्या लिखूँ?
दूर के ढोल और समाज-सुधार
जानिए कि लेखक 'दूर के ढोल' और समाज-सुधार के बारे में क्या कहते हैं।
मानटेन का रास्ता. अंग्रेज़ी निबंधकारों ने एक दूसरा रास्ता अपनाया, जिसकी शुरुआत मानटेन (Montaigne) से मानी जाती है: जो देखा, सुना और महसूस किया, वही लिख दिया। ऐसे निबंध मन की स्वच्छंद (खुली, बंधन-रहित) रचनाएँ होते हैं, जिनमें लेखक की सच्ची अनुभूति और खुशी झलकती है।
खुसरो की तरकीब. एक बार अमीर खुसरो को प्यास लगी। कुएँ पर चार स्त्रियाँ थीं; उन्होंने पानी के बदले चार चीज़ों पर कविता माँगी: खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल। खुसरो ने एक ही पद में चारों को जोड़ दिया। लेखक भी यही तय करता है: दोनों विषयों को एक ही निबंध में मिला दूँगा।
दूर के ढोल. ढोल पास बैठे लोगों के कान फाड़ता है, पर दूर से सुहावना लगता है, क्योंकि उसकी कर्कशता (कड़वी आवाज़) दूर तक नहीं पहुँचती। दूर बैठा आदमी उस आवाज़ में किसी शादी और एक शर्मीली नई बहू की कल्पना कर लेता है। बात यह है कि दूर रहने से हमें असलियत की कठोरता महसूस नहीं होती। जैसे किसी और की हथेली पर पड़ी छड़ी का दर्द सिर्फ़ वही जानता है जिसे पड़ी।
तरुण और वृद्ध. जवानों को भविष्य सुनहरा लगता है, बूढ़ों को बीता हुआ समय (अतीत)। दोनों दूर की चीज़ देख रहे हैं, और दोनों वर्तमान से असंतुष्ट हैं: जवान भविष्य को आज खींच लाना चाहते हैं, बूढ़े अतीत को। जवान क्रांति (बदलाव) के पक्ष में हैं, बूढ़े पुराने गौरव के रखवाले। इन दोनों की खींचतान से वर्तमान हमेशा क्षुब्ध रहता है, यानी बेचैन और हिला हुआ; और इसी से हर युग सुधारों का युग बना रहता है।
सुधार कभी ख़त्म नहीं होते. इतिहास में कोई ऐसा समय नहीं आया जब सुधार की ज़रूरत न हो: बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राममोहन राय, दयानंद, गांधी, फिर भी गिनती ख़त्म नहीं होती। न दोषों का अंत है, न सुधारों का; कल के सुधार आज दोष बन जाते हैं। आज जो जवान हैं, कल बूढ़े होकर अपने अतीत के सपने देखेंगे। दोनों के सपने मीठे हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। यानी दादा-दादी, फिर माता-पिता, फिर आप: हर पीढ़ी में यही चक्र।
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