रीढ़ की हड्डी
लड़की को परखने की रस्म
पढ़िए कि लड़की को परखने की रस्म में क्या हुआ।
मेहमान. रामस्वरूप 'हँ-हँ' करते हुए मेहमानों की खूब खुशामद करते हैं। गोपालप्रसाद चतुर और तजुर्बेकार हैं। शंकर की आवाज़ पतली है, वह बेढंगा हँसता (खीसें निपोरता) है, और उसकी कमर झुकी हुई है। यह झुकी कमर याद रखिए; शीर्षक का पहला अर्थ यहीं है।
पढ़ाई में पीछे क्यों? रामस्वरूप पूछते हैं कि कोर्स कब ख़त्म होगा, तो शंकर कहता है 'साल-दो साल', क्योंकि वह एक-आध साल का 'मार्जिन' रखता है। यानी उसे खुद पता नहीं कि पास होगा या नहीं। गोपालप्रसाद तुरंत बात सँभालते हैं कि शंकर एक साल बीमार रहा था। फिर वे अपने ज़माने की डींगें हाँकते हैं: दर्जनों कचौड़ियाँ, बारह घंटे की पढ़ाई। और शंकर को टोकते हैं कि झुककर क्यों बैठे हो, दोस्त ठीक कहते हैं कि उसकी 'बैकबोन'... (बात अधूरी रह जाती है)।
चाय पर बातें. गोपालप्रसाद मज़ाक करते हैं कि सरकार को खूबसूरती पर टैक्स लगाना चाहिए, और साफ़ कहते हैं कि लड़की का खूबसूरत होना निहायत ज़रूरी है। रामस्वरूप दावा करते हैं कि जायचा (जन्मपत्री) तो मिल ही गया है: उसे भगवान के आगे रख दिया, तो वह अपने-आप 'मिल' गया!
असली शर्त. फिर गोपालप्रसाद साफ़ कहते हैं कि उन्हें ज़्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए, हद से हद मैट्रिक; ऊँची पढ़ाई सिर्फ़ मर्दों के लिए है। अपनी बात के लिए वे कहते हैं: 'मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं', और शेर-शेरनी की भी यही बात। यानी कुछ चीज़ें सिर्फ़ नर के लिए हैं। यह स्त्रियों के साथ भेदभाव वाली सोच है।
उमा आती है. सादे कपड़ों में, पान की तश्तरी लेकर उमा आती है। उसके चेहरे पर सोने की रिम वाला चश्मा देखकर बाप-बेटे चौंकते हैं: कहीं पढ़ाई की वजह से तो नहीं? रामस्वरूप बहाना बनाते हैं कि आँखें दुखने आ गई थीं। फिर उमा सितार पर मीरा का भजन 'मेरे तो गिरधर गोपाल...' गाती है, पर शंकर की झेंपती आँखों से आँखें मिलते ही रुक जाती है। गोपालप्रसाद पेंटिंग, सिलाई और इनाम के बारे में पूछते हैं, मानो कोई सामान परखा जा रहा हो।
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