रीढ़ की हड्डी
उमा का प्रतिरोध
पढ़िए कि उमा ने अंत में किस तरह विरोध किया।
उमा बोलती है. गोपालप्रसाद पूछते हैं कि क्या उमा ने कोई इनाम जीता है; उमा चुप रहती है। पिता के बार-बार कहने पर वह धीमी पर मज़बूत आवाज़ में बोलती है: जब दुकान पर कुर्सी-मेज़ बिकती है, तो दुकानदार उससे कुछ नहीं पूछता, बस ख़रीदार को दिखा देता है। यानी उसे भी बेजान सामान की तरह दिखाया जा रहा है।
क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? वह कहती है कि ये महाशय ख़रीदार बनकर आए हैं। क्या लड़कियों के मन में कुछ नहीं होता, उन्हें दुख नहीं होता? क्या वे कोई बेबस पशु हैं जिन्हें देख-भालकर ख़रीद लिया जाए?
शंकर की पोल. गोपालप्रसाद गुस्से से भड़कते हैं कि उनकी इज़्ज़त उतारी जा रही है। तब उमा बताती है कि पिछली फ़रवरी में शंकर लड़कियों के होस्टल के आसपास घूमते पकड़ा गया था और मुँह छिपाकर भागा था। शंकर बस इतना कहता है: 'बाबूजी, चलिए।'
सच सामने. गोपालप्रसाद को बेटे की करतूत नहीं, बस एक बात सुनाई देती है: 'लड़कियों का होस्टल? तो क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो?' उमा गर्व से मानती है कि उसने कॉलेज में पढ़कर बी.ए. पास किया है, और इसमें कोई पाप या चोरी नहीं है। उसने किसी की तरह ताक-झाँक करके कायरता नहीं दिखाई, और उसे अपनी इज़्ज़त का ख़याल है। गोपालप्रसाद इसे 'दगा' (धोखा) कहकर अपनी छड़ी उठाते हैं और चल देते हैं।
अंत. जाते-जाते उमा कहती है: घर जाकर ज़रा पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे में रीढ़ की हड्डी है भी या नहीं। दोनों चले जाते हैं। उमा का गुस्सा अब सिसकियों में बदल जाता है, प्रेमा घबराकर आती है, और तभी रतन लौटता है: 'बाबूजी, मक्खन!' और परदा गिर जाता है।
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