रीढ़ की हड्डी
पात्र, प्रतीक और व्यंग्य
एकांकी के पात्रों, प्रतीकों और व्यंग्य को समझिए।
शीर्षक के दो अर्थ. 'रीढ़ की हड्डी' आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है। यह दो अर्थों में आता है: गोपालप्रसाद के लिए यह शंकर की झुकी कमर है (शरीर की बात); उमा के लिए यह शंकर के कमज़ोर चरित्र की बात है।
उमा और शंकर. उमा स्वाभिमानी, साहसी, साफ़ बोलने वाली और पढ़ी-लिखी है। उसकी नज़र में शिक्षा का सही अर्थ है आत्मबल और अपने विचार रखना, सिर्फ़ डिग्री या नौकरी नहीं। शंकर पढ़ा-लिखा होकर भी अपनी कोई राय नहीं रखता: पिता की हर बात में हाँ मिलाता है, पढ़ाई में 'मार्जिन' रखता है, और पकड़े जाने पर भाग खड़ा हुआ था। उसमें नैतिक साहस नहीं है।
दो पिता, एक जैसे. रामस्वरूप ने उमा को बी.ए. तक पढ़ाकर आधुनिक सोच दिखाई, पर शादी के लिए उसकी पढ़ाई छिपाई और झूठ बोला। गोपालप्रसाद खुद वकील होकर भी कम पढ़ी बहू चाहते हैं। दोनों दिखावे और पुरानी परंपरा के शिकार हैं; दोनों समाज के आगे झुके हैं।
किस पर व्यंग्य? एकांकी समाज की गलत मान्यताओं पर चोट करती है: लड़कियों की पढ़ाई को बेकार मानना, उन्हें बिकाऊ चीज़ की तरह परखना, खूबसूरती को सबसे बड़ा गुण मानना, और लड़के-लड़कियों से अलग-अलग उम्मीदें रखना। इसके संवाद स्वाभाविक और व्यंग्य भरे हैं, जैसे 'खूबसूरती पर टैक्स'।
प्रेमा की सोच ('पढ़ाई-लिखाई के जंजाल मेरी समझ में नहीं आते') उस समय की स्त्री-शिक्षा का हाल दिखाती है: तब ऊँची पढ़ाई को लड़कियों के लिए बेकार माना जाता था, और स्त्रियाँ खुद भी यही सोचती थीं। (और आज भी कई जगह लड़कियों को 'दिखाने' का यह रिवाज़ बचा है; सोचिए, कितना बदला है?)
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