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पद

अनुप्रास, उपमा, रूपक

पदों में अनुप्रास, उपमा और रूपक पहचानिए।

अलंकार कविता की शोभा बढ़ाते हैं, जैसे गहने किसी की। अनुप्रास: जहाँ एक ही व्यंजन बार-बार आए, जैसे 'चितवत चंद चकोरा' (च, च, च)।

उपमा: किसी जानी-मानी चीज़ से तुलना करके रूप, गुण या स्वभाव बताना, जैसे 'जैसे सोने मिलत सुहागा'। उपमा में अक्सर 'जैसे', 'सा', 'सम' जैसे शब्द आते हैं।

रूपक: जहाँ तुलना इतनी गहरी हो कि दोनों को एक ही मान लिया जाए, 'जैसे' हटा दिया जाए। 'चरन कमल': चरण कमल जैसे नहीं, चरण ही कमल हैं। याद रखने की तरकीब: उपमा 'जैसा' कहती है, रूपक 'वही है' कहता है।

पदों की विशेषताएँ: अनन्य भक्ति; सरल, लोक की ब्रजभाषा (मोरा, बाती, राती); उपमा और तुलना; लय और गाने लायक बनावट (पंक्तियों के अंत का मेल: पानी-समानी, मोरा-चकोरा); और दृढ़ निष्ठा और आस्था (जैसे 'तीरथ बरत न करूँ अंदेसा')।

पद गाए जाते हैं, और उनके अंत में कवि का नाम आता है, जिसे 'छाप' कहते हैं: 'ऐसी भगति करै रैदासा'।

उपमा 'जैसा' कहती है, रूपक 'वही है' कहता है।

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