पद
संत परंपरा, सुहागा और नामदेव
संत परंपरा और संत नामदेव के बारे में जानिए।
संत कवि. भक्तिकाल के संत कवि (रैदास, कबीर, नामदेव) निराकार (बिना रूप वाले) ईश्वर की भक्ति, मन की सच्चाई, समानता, प्रेम और भाईचारे पर ज़ोर देते हैं।
क्यों? उस समय समाज में जाति-भेद, ऊँच-नीच और कर्मकांड का बोलबाला था; पूजा और तीर्थ पर कुछ ही लोगों का हक़ माना जाता था। संतों ने कहा: ईश्वर हर जगह है, और सच्चे मन से हर कोई उसे पा सकता है।
सुहागा क्या है? सुहागा (बोरेक्स) एक प्राकृतिक खनिज है। सोना गलाते समय इसे मिलाया जाता है; यह सोने की अशुद्धियाँ खींच लेता है, जिससे सोना और साफ़ और चमकदार निकलता है। इसीलिए 'सोने पर सुहागा' कहते हैं जब किसी अच्छी चीज़ में और अच्छाई जुड़ जाए।
नामदेव (13वीं-14वीं सदी, महाराष्ट्र) भी निर्गुण संत थे। उनके पद में राम-नाम के बिना वैसी बेचैनी है जैसे बछड़े बिना गाय, या पानी बिना मछली; और गुरु से मिलते ही उन्हें 'अलख' (जिसे आँखों से न देखा जा सके, निराकार ईश्वर) के दर्शन हुए।
पुराने शब्द, आज के रूप: मोरा → मोर, चकोरा → चकोर, बाती → बत्ती, राती → रात, सोने → सोना, तीरथ → तीर्थ, बरत → व्रत।
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