राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
तुलसीदास और स्वयंवर की सभा
तुलसीदास के बारे में जानिए और सीता-स्वयंवर की सभा का प्रसंग समझिए।
कवि. गोस्वामी तुलसीदास (जीवन-काल लगभग 1532–1623) उत्तर प्रदेश के थे। उनका सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस है; कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक भी उन्हीं के हैं। वे अवधी और ब्रज दोनों के कवि थे: रामचरितमानस अवधी में है, विनयपत्रिका और कवितावली ब्रज में। उनका देहांत काशी में हुआ। यह अंश रामचरितमानस के बालकांड से है।
पहले कहानी समझिए. कविता कठिन लगे तो पहले दृश्य मन में बनाइए। राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साथ मिथिला में राजा जनक की सभा में हैं; सीता का स्वयंवर है। शर्त है शिव का धनुष चढ़ाना, जिसे कोई राजा हिला तक न सका। राम ने उसे उठाया, और चढ़ाते-चढ़ाते धनुष टूट गया। शिव के परम भक्त परशुराम यह सुनकर क्रोध में भरे सभा में आ पहुँचते हैं। सभा में राजा, जनक, सीता, उनकी माता और सखियाँ, सब मौजूद हैं।
सब डर गए. परशुराम का भयानक (कराल) वेश देखते ही सारे राजा (भुआला) घबराकर उठ खड़े हुए। हर राजा अपने पिता के नाम के साथ अपना नाम बताकर दंडवत (ज़मीन पर लेटकर) प्रणाम करने लगा। यह डर में लिपटा शिष्टाचार था। परशुराम जिसकी ओर भी सहज भाव से देखते, उसे लगता कि अब उसकी उम्र पूरी हो गई!
सीता और राम. जनक ने आकर सिर झुकाया और सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया; परशुराम ने आशीर्वाद दिया तो सखियाँ खुश होकर सीता को वापस ले गईं। फिर विश्वामित्र मिले और राम-लक्ष्मण को परशुराम के चरणों में झुकाया: 'ये दशरथ के बेटे हैं।' परशुराम ने आशीर्वाद दिया, और राम का रूप देखते ही रह गए: ऐसा रूप जो कामदेव का घमंड भी तोड़ दे।
छंद की बनावट. इस अंश में चौपाई और दोहे का क्रम है: आठ अर्धालियों (चौपाई की पंक्तियों) के बाद एक दोहा आता है। पढ़ते समय यह लय पकड़िए।
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