राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
परशुराम का क्रोध और सभा का भय
पढ़िए कि परशुराम क्रोधित क्यों हुए और सभा क्यों डर गई।
टूटा धनुष दिखा. परशुराम जानते हुए भी अनजान बनकर जनक से पूछते हैं कि इतनी भीड़ क्यों है। जनक बताते हैं कि राजा स्वयंवर के लिए आए थे। तभी परशुराम की नज़र धरती पर पड़े धनुष के टुकड़ों पर पड़ती है।
क्रोध. शिव उनके आराध्य हैं; उनका धनुष टूटा देखकर वे भड़क उठते हैं। जनक को 'जड़' (मूर्ख) कहते हैं और धमकी देते हैं: तोड़ने वाले को जल्दी दिखाओ, वरना जहाँ तक तुम्हारा राज्य है, सब उलट दूँगा।
जनक का मौन और राजाओं की खुशी. जनक बहुत डर जाते हैं और कोई जवाब नहीं देते। और जो राजा धनुष नहीं तोड़ पाए थे, वे इस मुसीबत से मन-ही-मन खुश होते हैं ('कुटिल भूप हरषे मन माहीं'): यह ईर्ष्या भरी खुशी है।
सब चिंता में. देवता, मुनि, नाग, नगर के स्त्री-पुरुष, सबके मन में भारी त्रास (डर) है। सीता की माँ सुनयना पछताती हैं: 'बिधि अब सँवरी बात बिगारी', यानी इतनी मुश्किल से बात बनी थी, और विधाता ने उसे बिगाड़ दिया!
आधा पल, एक कल्प. परशुराम का स्वभाव जानकर सीता इतनी व्याकुल हैं कि आधा पल भी 'कल्प' जितना लंबा लगता है। (कल्प यानी ब्रह्मा का एक दिन, करोड़ों वर्ष।) यह अतिशयोक्ति है: डर में समय रुक-सा जाता है। समझने का क्रम: संदर्भ → कारण → भाव → परिणाम → निष्कर्ष। जैसे: जनक का मौन; कारण डर; परिणाम यह कि क्रोध और नहीं भड़का।
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