राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
संवाद की विधा और पात्रों के भाव
समझिए कि इस कविता में संवाद नाटक जैसे कैसे लगते हैं।
कविता में नाटक. यह अंश कविता होकर भी नाटक जैसा है: कहानी मुख्य रूप से संवादों से आगे बढ़ती है, परशुराम के गुस्से भरे वाक्यों और लक्ष्मण के व्यंग्य भरे जवाबों से।
संवाद से चरित्र. हर पात्र अपने शब्दों से पहचाना जाता है: परशुराम गुस्से से भरे, राम विनम्र, और लक्ष्मण तीखे। लेखक को बताना नहीं पड़ता कि कौन कैसा है।
पौराणिक संदर्भ भी आते हैं: सहस्रबाहु (जिसे परशुराम ने मारा था) और त्रिपुरारि शिव। इनसे कहानी में पुरानी कथाओं की गहराई आती है।
बिना नाम के कथन. कविता की एक खासियत: हर कथन से पहले बोलने वाले का नाम नहीं लिखा, फिर भी भाव से पहचान में आ जाता है कि कौन बोल रहा है। (कोशिश कीजिए: हर पंक्ति के आगे मन में वक्ता का नाम लगाइए।)
भाव-तालिका के खाने: भाव → पंक्ति → पात्र → कारण। जैसे: चिंता → 'बिधि अब सँवरी बात बिगारी' → सुनयना → बेटी के विवाह पर संकट का डर। भय → 'उठे सकल भय बिकल भुआला' → राजा → परशुराम का भयानक वेश। संयम/विनम्रता → राम। 'मौन संवाद' लिखना हो तो पात्र के मन से शुरू करें: सीता की व्याकुलता, सुनयना का पछतावा।
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