LearnWave
Learn it. Master it.

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

अलंकार, अवधी और लोकोक्तियाँ

कविता के अलंकार, अवधी शब्द और लोकोक्तियाँ पहचानिए।

परशुराम के नाम: भृगुपति (भृगु-वंश के स्वामी), परसुधर (फरसा धारण करने वाले; चित्रों में वे फरसे के साथ दिखते हैं), भृगुकुलकेतु (भृगु-वंश के ध्वज, यानी उसकी शान)।

अनुप्रास: एक वर्ण बार-बार, जैसे 'बहुरि बिलोकि बिदेह' में ब, और 'सुर मुनि नाग नगर नर नारी' में न। अतिशयोक्ति: बात बहुत बढ़ाकर कहना, जैसे पूरी धरती उलट देने की धमकी, या आधा पल कल्प जैसा।

रूपक: 'पद सरोज' = चरण रूपी कमल। उपमा होती तो 'कमल जैसे चरण' कहा जाता; यहाँ 'जैसे' नहीं है, चरणों को सीधे कमल ही कह दिया, इसलिए रूपक।

अवधी से खड़ी बोली: सीय → सीता, रिस → क्रोध, बेगि → शीघ्र, लोचन → नेत्र, बचन → वचन। अवधी हिंदी का ही एक रूप है, जो उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में बोली जाती है।

लोकोक्ति एक पूरा वाक्य होती है जिसमें अनुभव का निचोड़ हो, जैसे 'जैसा राजा वैसी प्रजा', या 'सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े' (काम शुरू होते ही मुसीबत आ गई; जैसे धनुष टूटते ही परशुराम आ गए!)। 'धनुष' दूसरी भाषाओं में: कमान (उर्दू, कश्मीरी), धनुष्य (मराठी), धणुख (पंजाबी), विल्लु (तेलुगु, तमिल), बिल्लु (कन्नड़)।

एक कविता में तीन अलंकार, और एक शब्द कई भाषाओं में।

Practise this lesson

Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.

No account, no email address. Opens the real product.