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शिवपूजन सहाय — माता का अँचल

भोलानाथ और बाबू जी

पिता के वात्सल्य के प्रसंगों का वर्णन करना।

पाठ. यह शिवपूजन सहाय के एक उपन्यास का अंश है, जिसमें तीस के दशक (लगभग सौ साल पहले) के गाँव का जीवन है। कहानी एक छोटा बच्चा खुद सुनाता है। उसका असली नाम तारकेश्वरनाथ है, पर पिता उसे प्यार से 'भोलानाथ' कहते हैं। वह पिता को 'बाबू जी' और माँ को 'मइयाँ' कहता है।

पिता के साथ सुबह. भोलानाथ बचपन से पिता के साथ रहता, उन्हीं के साथ बाहर की बैठक में सोता। माँ से उसका नाता बस दूध पीने तक था। बाबू जी तड़के (सुबह-सुबह) उठकर, नहा-धोकर पूजा करते; बच्चे को भी नहलाकर पूजा पर बिठाते। वह ज़िद करता, तो उसके चौड़े माथे पर भभूत (पवित्र राख) का त्रिपुंड (तीन आड़ी रेखाओं वाला तिलक) लगा देते। लंबी जटाओं और भभूत से वह अच्छा-खासा 'बम-भोला' बन जाता।

राम-नाम और मछलियाँ. बाबू जी रामायण पढ़ते, तो भोलानाथ बगल में बैठकर आईने में अपना मुँह निहारता; वे देखते, तो वह शर्माकर आईना नीचे रख देता। फिर वे 'रामनामा बही' पर हज़ार बार राम-नाम लिखते, और पाँच सौ बार छोटे कागज़ों पर लिखकर आटे की गोलियों में लपेटते। ये गोलियाँ लेकर वे गंगा जाते और मछलियों को खिलाते; भोलानाथ उनके कंधे पर बैठा हँसता रहता।

खेल के साथी. लौटते समय बाबू जी उसे पेड़ की झुकी डाल पर झूला झुलाते। कभी उससे कुश्ती लड़ते और जान-बूझकर ढीले पड़कर हार जाते, ताकि बच्चे का हौसला बढ़े। उतान (पीठ के बल) गिर जाते, और बच्चा उनकी छाती पर चढ़कर मूँछें नोचने लगता।

खट्टा-मीठा चुम्मा. फिर बाबू जी 'खट्टा और मीठा चुम्मा' माँगते: बाएँ गाल का खट्टा, दाहिने का मीठा। मीठा लेते समय दाढ़ी-मूँछ उसके कोमल गालों पर गड़ा देते। वह झुँझलाकर फिर मूँछें नोचता, और बाबू जी बनावटी रोना रोते; बच्चा खिलखिलाकर हँसता।

सोचिए. आपके घर में कौन आपके साथ सबसे ज़्यादा खेलता है? पिता के प्यार के ऐसे ही दो प्रसंग अपने शब्दों में लिखिए।

बाबू जी भोलानाथ के दिन भर के साथी थे: पूजा, गंगा, झूला, कुश्ती और खट्टा-मीठा चुम्मा।

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