मन्नू भंडारी — एक कहानी यह भी
शीला अग्रवाल, साहित्य और आज़ादी की लड़ाई
स्वाधीनता आंदोलन में लेखिका की भूमिका और शीला अग्रवाल के प्रभाव को समझाना।
रसोई से दूर. सन् '44 में सुशीला की शादी हुई, दोनों भाई पढ़ने बाहर चले गए। तब पहली बार पिता जी का ध्यान मन्नू पर गया। उनका आग्रह था कि वे रसोई से दूर रहें; रसोई को वे 'भटियारखाना' कहते, जहाँ रहना अपनी प्रतिभा को भट्ठी में झोंकना है। घर की राजनीतिक बहसों में वे बेटी को पास बैठाते।
शीला अग्रवाल. सन् '45 में दसवीं पास कर फ़र्स्ट इयर में आईं, तो हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल मिलीं। उन्होंने चुन-चुनकर किताबें पढ़वाईं: शरत्, प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा (जैनेंद्र का 'त्यागपत्र', भगवती बाबू का 'चित्रलेखा')। उन्होंने साहित्य का दायरा बढ़ाया और बहसों को काम में बदल दिया।
रगों में लावा. '46-'47 के दिन थे: हड़तालें, जुलूस, भाषण, प्रभात-फेरियाँ। शीला अग्रवाल की बातों ने मन्नू की रगों के खून को लावा बना दिया। वे नारे लगातीं, हड़तालें करवातीं, लड़कों के साथ सड़कों पर निकलतीं; उनके एक इशारे पर कॉलेज की लड़कियाँ कक्षाएँ छोड़कर मैदान में आ जातीं।
पिता का दोहरा रूप. यह 'दोहरा व्यवहार' किसी को चाहने या नफ़रत करने का नहीं, दो चाहतों के टकराव का है:
- पिता चाहते थे कि बेटी 'विशिष्ट' बने, उसका नाम हो;
- पर साथ ही उन्हें समाज की इज़्ज़त की उतनी ही फ़िक्र थी।
घर में बैठकर देश की बात सुनना ठीक था; सड़क पर नारे लगाती बेटी उन्हें बर्दाश्त नहीं थी।
दो घटनाएँ.
- प्रिंसिपल का पत्र: पिता जी गुस्से में गए, पर गर्व से लौटे ('यह तो पूरे देश की पुकार है'); मन्नू को न आँखों पर भरोसा हुआ, न कानों पर।
- चौपड़ का भाषण: एक दकियानूसी मित्र ने ताने मारे, पिता जी भड़के और कहा 'इसका घर से निकलना बंद करो'; रात को अजमेर के सबसे इज़्ज़तदार डॉ. अंबालाल ने आकर मन्नू के भाषण की तारीफ़ की, और पिता जी का चेहरा गर्व से भर गया।
उनकी कमज़ोरी थी 'यश-लिप्सा', यानी नाम की भूख।
15 अगस्त 1947. मई '47 में कॉलेज ने शीला अग्रवाल को नोटिस दे दिया, और जुलाई में मन्नू समेत दो-तीन छात्राओं का प्रवेश रोक दिया। बाहर से इतना हंगामा हुआ कि अगस्त में थर्ड इयर फिर खोलना पड़ा। पर यह जीत उस बड़ी खुशी के आगे छोटी पड़ गई: 15 अगस्त 1947, शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि।
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