यतींद्र मिश्र — नौबतखाने में इबादत
डुमराँव, बालाजी मंदिर और अमीरुद्दीन का बचपन
बिस्मिल्ला खाँ के बचपन और उनकी संगीत-शिक्षा के स्रोत समझाना।
लेखक और पाठ. यतींद्र मिश्र सन् 1977 में अयोध्या में पैदा हुए; कवि और संगीत के गहरे जानकार हैं (गायिका गिरिजा देवी पर उनकी किताब है 'गिरिजा')। यह पाठ शहनाई-वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्ति-चित्र है: उनका जीवन, उनकी रुचियाँ, और संगीत के लिए उनकी लगन।
डुमराँव और रीड. बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था; उनका जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ। शहनाई में एक रीड लगती है, अंदर से पोली, जिससे फूँककर बजाते हैं। यह रीड नरकट नाम की घास से बनती है, जो डुमराँव में सोन नदी के किनारे मिलती है। इसीलिए शहनाई की दुनिया में डुमराँव याद किया जाता है।
परिवार. उनके पिता उस्ताद पैगंबरबख्श खाँ, माँ मिट्ठन, परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ। बड़े भाई शम्सुद्दीन उनसे तीन साल बड़े थे।
ननिहाल काशी. पाँच-छह साल की उम्र में अमीरुद्दीन नाना के घर काशी आ गए। उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श देश के मशहूर शहनाई-वादक थे। रोज़ दिन की शुरुआत बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी (दरवाज़ा) पर शहनाई बजाकर होती; यह अलीबख्श के घर का खानदानी काम था।
रसूलन और बतूलन. चौदह साल के अमीरुद्दीन रियाज़ के लिए बालाजी मंदिर जाते, पर उस रास्ते से जो गायिका बहनों रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर से होकर गुज़रता। वहाँ से ठुमरी, टप्पे, दादरा सुनाई देते। खाँ साहब ने खुद माना कि संगीत से लगाव इन्हीं बहनों को सुनकर हुआ।
नन्हे अमीरुद्दीन की शरारतें.
- चार साल की उम्र में छिपकर नाना को बजाते सुनते, फिर ढेरों शहनाइयों में नाना वाली 'मीठी शहनाई' खोजते;
- मामा जब सम (ताल का वह स्थान जहाँ लय पूरी होती है) पर आते, तो खुश होकर पत्थर पटकते; उन्हें पता नहीं था कि दाद 'वाह' कहकर दी जाती है।
फ़िल्मों का बुख़ार. बचपन में उन्हें फ़िल्मों का बुख़ार था (शहनाई का नहीं)। थर्ड क्लास का टिकट छह पैसे का था: दो पैसे मामा से, दो मौसी से, दो नानी से। बाद में बालाजी मंदिर पर बजाने से मिली अठन्नी लेकर अभिनेत्री सुलोचना की हर नई फ़िल्म देखते, और कुलसुम हलवाइन की देसी घी वाली कचौड़ी खाते। कचौड़ी के घी में पड़ते समय की छन्न में उन्हें सुरों का उतार-चढ़ाव सुनाई देता: 'संगीतमय कचौड़ी'।
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