यतींद्र मिश्र — नौबतखाने में इबादत
शहनाई और सुर की इबादत
बिस्मिल्ला खाँ के लिए संगीत के इबादत होने का अर्थ समझाना।
शहनाई क्या है? वेदों में शहनाई का ज़िक्र नहीं। यह सुषिर वाद्य है, यानी फूँककर बजने वाला (जैसे बाँसुरी, नागस्वरम्, बीन)। अरब देशों में रीड वाले फूँक-वाद्य को 'नय' कहते हैं; शहनाई को 'शाहेनय', यानी नयों का शाह (राजा) कहा गया।
मंगल का वाद्य. तानसेन की एक बंदिश में शहनाई का ज़िक्र है। अवधी लोकगीतों और चैती में शहनाई बार-बार आती है; यह शुभ मौकों का वाद्य है, जैसे दक्षिण में नागस्वरम्। सुबह की मंगल-ध्वनि के नायक हैं बिस्मिल्ला खाँ।
चार तरह के वाद्य, एक नज़र में:
- तत: तार वाले (वीणा, सितार, सारंगी, सरोद);
- सुषिर: फूँककर बजने वाले (बाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम्, बीन);
- घन: धातु पर चोट से (झाँझ, मंजीरा, घुँघरू);
- अवनद्ध: चमड़े से मढ़े (तबला, ढोलक, मृदंग)।
'मेरे मालिक, एक सुर बख्श दे'. अस्सी बरस से खाँ साहब पाँचों वक़्त की नमाज़ में बस एक चीज़ माँगते: सच्चा सुर। सजदे में गिड़गिड़ाते: ऐसा सुर दे कि सुनने वालों की आँखों से सच्चे मोती जैसे आँसू निकल आएँ। इतने बड़े कलाकार होकर भी उन्हें लगता था कि सातों सुरों को बरतने का सलीका अभी पूरा नहीं आया।
कस्तूरी वाला हिरन. लेखक कहता है: जैसे हिरन अपनी ही कस्तूरी की खुशबू से परेशान होकर पूरे जंगल में उसे ढूँढ़ता है, जबकि वह उसी के भीतर है, वैसे ही खाँ साहब उस सुर को खोजते रहे जो उनके भीतर ही था।
फटी लुंगी. भारत रत्न मिलने के बाद एक शिष्या ने डरते-डरते टोका: बाबा, आप फटी तहमद (लुंगी) में लोगों से मत मिला कीजिए। खाँ साहब मुसकराए: 'ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।' मालिक से दुआ है कि फटा सुर न दे; लुंगी तो आज फटी है, कल सिल जाएगी। उनके लिए संगीत सबसे ऊपर था, दिखावा कुछ नहीं।
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