जयशंकर प्रसाद — आत्मकथ्य
सुख का स्वप्न और स्मृति का पाथेय
सुख के स्वप्न और स्मृति-पाथेय का भाव स्पष्ट करना।
कविता की शुरुआत. मधुप (भौंरा, यहाँ मन का प्रतीक) गुनगुनाकर न जाने कौन-सी अपनी कहानी कह जाता है। आज ढेर सारी पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं। इस विशाल नीले आकाश के नीचे अनगिनत लोगों की जीवन-कहानियाँ हैं, जो अपनी ही हँसी उड़ाती रहती हैं। फिर भी तुम चाहते हो कि मैं अपनी कहानी कहूँ?
हाथ न आया सुख. कवि ने जिस सुख का सपना देखा, वह कभी मिला ही नहीं। वह बिल्कुल पास आया, मुसकराया और भाग गया; और कवि की नींद टूट गई। जीवन में अधूरापन रह गया।
प्रिय की सुंदरता. कवि अपनी प्रिय की याद करता है। उसके लाल गालों (अरुण कपोल) की छाया इतनी सुंदर थी कि प्रेम भरी उषा (सुबह की लाली) भी अपनी लाली उसी से लेती थी। यह सपना-सा सुंदर समय था।
'उज्ज्वल गाथा' क्यों नहीं? चाँदनी रातों में खिलखिलाती मीठी बातें उसकी अपनी निजी पूँजी हैं। उन्हें सबके सामने 'उज्ज्वल गाथा' (चमकती कहानी) बनाकर गाना उसे ठीक नहीं लगता।
याद ही 'पाथेय'. पाथेय यानी सफ़र में साथ ले जाया जाने वाला खाना। कवि कहता है: उस प्रिय की याद ही मुझ थके राही का पाथेय है; उसी के सहारे जीवन का रास्ता कट रहा है।
गुदड़ी की सिलाई. कंथा यानी गुदड़ी, जिसमें कपड़े की कई परतें सिली होती हैं। कवि पूछता है: मेरी कंथा की सीवन (सिलाई) उधेड़कर क्या देखोगे? मतलब: मेरे मन की छिपी परतें, दुख और यादें क्यों खोलना चाहते हो?
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