जयशंकर प्रसाद — आत्मकथ्य
काव्यभाषा और आत्मकथा-लेखन
कविता की काव्यभाषा पहचानना और आत्मकथात्मक लेखन करना।
भाषा कैसी है? खड़ी बोली, पर कोमल और तत्सम शब्दों से भरी, यानी संस्कृत से सीधे आए शब्द: प्रवंचना, पाथेय, अनंत-नीलिमा, अनुरागिनी।
प्रतीक (बात को किसी और चीज़ से कहना).
- मधुप = मन;
- गागर रीती = खाली जीवन;
- मुरझाकर गिरती पत्तियाँ = बीतता जीवन, निराशा;
- कंथा = मन की परतें;
- पाथेय = याद, जो सहारा देती है।
मानवीकरण (चीज़ों को इंसान जैसा बताना). 'अनुरागिनी उषा' (प्रेम करने वाली सुबह), 'थकी सोई व्यथा' (थककर सोया दर्द)। संबोधन: 'अरी सरलते'। प्रश्न शैली: 'सुनकर क्या तुम भला करोगे?' इसे छायावादी शैली कहते हैं।
हिंदी की पहली आत्मकथा. बनारसीदास जैन का 'अर्धकथानक' हिंदी की पहली आत्मकथा मानी जाती है; यह पद्य (कविता) में है। किताब में बच्चन की कविता 'आत्म-परिचय' भी तुलना के लिए दी है: प्रसाद जहाँ विनम्रता से चुप रहना चुनते हैं, बच्चन खुलकर अपने बारे में बोलते हैं।
आत्मकथा कोई भी लिख सकता है. इसके लिए बड़ा आदमी होना ज़रूरी नहीं; सच्चाई और हिम्मत चाहिए। गुड़गाँव में घरों में काम करने वाली बेबी हालदार ने 'आलो आँधारि' लिखी। गांधी जी की 'सत्य के प्रयोग' में ईमानदारी सबसे बड़ी बात है।
आपकी बारी. अपने जीवन की किसी एक घटना के बारे में सच-सच लिखिए: क्या हुआ, आपने क्या महसूस किया, क्या सीखा। यही छोटी-सी आत्मकथा है।
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