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स्वयं प्रकाश — नेताजी का चश्मा

कस्बा, मूर्ति और बदलते चश्मे

नेताजी की मूर्ति पर बदलते चश्मों का कारण समझाना।

लेखक. स्वयं प्रकाश सन् 1947 में इंदौर में पैदा हुए; मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़कर नौकरी की, जीवन का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बीता; 'वसुधा' पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे। उनके तेरह कहानी-संग्रह छपे; उन्हें पहल सम्मान और बनमाली पुरस्कार मिले। इनका निधन 2019 में हुआ।

हालदार साहब और कस्बा. हालदार साहब (यह उनका नाम है, 'हवलदार' जैसा कोई पद नहीं) कंपनी के काम से हर पंद्रहवें दिन एक छोटे कस्बे से गुज़रते थे। कस्बे की नगरपालिका ने मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति लगवाई थी: फ़ौजी वर्दी वाली, लगभग दो फुट की बस्ट (सिर से सीने तक की मूर्ति)।

मूर्ति में एक कमी. मूर्ति कस्बे के हाई स्कूल के ड्राइंग मास्टर मोतीलाल ने बनाई थी। सब ठीक था, बस पत्थर का चश्मा नहीं था। उसकी जगह एक असली चश्मे का काला फ्रेम पहना दिया गया था। हालदार साहब को यह मज़ेदार लगा: 'मूर्ति पत्थर की, लेकिन चश्मा रियल!'

चश्मा बदलता क्यों है? हर बार गुज़रते तो नया चश्मा दिखता: कभी मोटा चौकोर, कभी तार वाला गोल। पानवाले ने हँसकर बताया: यह कैप्टन चश्मेवाला करता है। जब कोई ग्राहक मूर्ति पर लगे जैसा फ्रेम माँगता, तो कैप्टन (शायद नेताजी से माफ़ी माँगकर) उसे उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर दूसरा लगा देता।

ओरिजिनल चश्मा कहाँ गया? पानवाला बोला: 'मास्टर बनाना भूल गया।' हालदार साहब ने सोचा: बेचारे मास्टर ने शायद पत्थर में पारदर्शी चश्मा बनाने का तरीका न सोच पाया हो, या कोशिश की और नहीं बना, या बनाते-बनाते टूट गया, या अलग से बनाकर लगाया और वह निकल गया।

कैप्टन कौन है? हालदार साहब ने पूछा: क्या कैप्टन नेताजी का साथी था, या आज़ाद हिंद फ़ौज का सिपाही? पानवाले ने मज़ाक उड़ाया: 'वो लँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में। पागल है पागल!' हालदार साहब को यह अच्छा नहीं लगा। फिर उन्होंने कैप्टन को देखा: एक बहुत बूढ़ा, कमज़ोर, लँगड़ा आदमी, सिर पर गांधी टोपी, एक हाथ में छोटी संदूकची, दूसरे में बाँस पर टँगे चश्मे। उसकी दुकान भी नहीं, वह फेरी लगाता है।

पानवाले की बोली. 'कोई गिराक आ गया समझो… तो कैप्टन किदर से लाएगा?… उदर दूसरा बिठा दिया।' यह स्थानीय बोली है। मानक हिंदी में: ग्राहक, किधर (कहाँ), उधर (वहाँ)।

मूर्ति पर चश्मा बार-बार बदलता है, क्योंकि गरीब फेरीवाला कैप्टन नेताजी को बिना चश्मे के नहीं देख सकता।

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