यशपाल — लखनवी अंदाज़
खीरा: सूँघकर 'खाना'
नवाब साहब के व्यवहार में छिपे दिखावे पर व्यंग्य समझाना।
खीरे की तैयारी, कदम-दर-कदम. नवाब साहब ने:
- तौलिया झाड़कर सामने बिछाया;
- लोटे से दोनों खीरे खिड़की के बाहर धोकर पोंछे;
- जेब से चाकू निकालकर सिर काटे और गोदकर झाग निकाला;
- बड़े एहतियात (सावधानी) से छीलकर फाँकें करीने से सजाईं;
- उन पर जीरा मिला नमक और लाल मिर्च बुरकी (छिड़की)।
मुँह में पानी. उनके चेहरे और जबड़ों से साफ़ था कि मुँह में पानी भर आया है। नमक-मिर्च वाली रसीली फाँकें देखकर लेखक का भी जी ललचा रहा था, पर वह मना कर चुका था। दोबारा पूछा गया तो बोला: 'इस वक़्त तलब नहीं, मेदा (पेट) भी ज़रा कमज़ोर है।'
सूँघो और फेंको. अब नवाब साहब ने एक-एक फाँक उठाई, होंठों तक ले गए, सूँघी, स्वाद के मज़े में आँखें मूँद लीं, और फाँक खिड़की से बाहर फेंक दी। इसी तरह सारी फाँकें फेंक दीं।
गर्व और डकार. फिर तौलिए से हाथ-होंठ पोंछकर गर्व से लेखक को देखा, मानो कह रहे हों: खानदानी रईसों का तरीका यह है! थककर लेट गए, और फिर पेट भरे वाली ज़ोर की डकार ली। बोले: खीरा लज़ीज़ (स्वादिष्ट) होता है, पर सकील (मुश्किल से पचने वाला), बेचारे मेदे पर बोझ डाल देता है।
ऐसा क्यों किया? नवाब साहब यह दिखाना चाहते थे कि वे आम लोगों की तरह खीरा नहीं खाते; उनकी नज़ाकत और नफ़ासत अलग है। यह सनक (अजीब शौक) और झूठी शान है।
यशपाल का निशाना. लेखक इस पतनशील सामंती वर्ग (गिरते हुए नवाबी-ज़मींदार तबके) पर व्यंग्य करता है, जो सच्चाई से बेख़बर है और दिखावटी जीवन का आदी है। किताब कहती है: ऐसी परजीवी संस्कृति आज भी दिखती है।
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