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यशपाल — लखनवी अंदाज़

नयी कहानी पर व्यंग्य और क्रिया-भेद

रचना के व्यंग्य को समझाना और क्रिया-भेद पहचानना।

कहानी का असली मज़ाक. अंत में लेखक के 'ज्ञान-चक्षु खुल गए': 'ये हैं नयी कहानी के लेखक!' लेखक का तर्क उलटा करके देखिए: अगर कोई खीरा सिर्फ़ सूँघकर भरे पेट की डकार ले सकता है, तब तो बिना विचार, बिना घटना, बिना पात्रों के भी, बस मन से, 'नयी कहानी' लिखी जा सकती होगी!

व्यंग्य किस पर? उस समय कुछ लेखक कहते थे कि कहानी बिना कथ्य (कहने लायक बात) के भी लिखी जा सकती है। यशपाल ने यह रचना यह दिखाने के लिए लिखी कि बिना कथ्य के कहानी नहीं बनती, ठीक वैसे जैसे सूँघने से पेट नहीं भरता। (कुछ वीडियो यह हिस्सा छोड़ देते हैं; यही पाठ की जान है।)

आज भी ऐसे लोग. दिखावे के लिए जीने वाला यह सामंती स्वभाव आज भी दिखता है। प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' (और उस पर सत्यजीत राय की फ़िल्म) में भी ऐसे ही नवाबों का चित्र है, जो शतरंज में डूबे रहे और राज चला गया।

सकर्मक और अकर्मक क्रिया. क्रिया से पूछिए 'क्या?':

  • जवाब मिले तो सकर्मक (कर्म के साथ): 'चाकू निकाला' (क्या? चाकू); 'खीरे खरीदे' (क्या? खीरे);
  • जवाब न मिले तो अकर्मक: 'पालथी मारे बैठे थे', 'थककर लेट गए'।

पूर्वकालिक क्रिया. '-कर' वाली क्रियाएँ बताती हैं कि एक काम पहले हुआ, फिर दूसरा: 'गोदकर झाग निकाला', 'थककर लेट गए'। इन्हें पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं।

नवाबों की सनक. क्या कोई सनक अच्छी भी हो सकती है? जैसे किसी की पेड़ लगाने की 'सनक', या रोज़ सफ़ाई की। अपनी राय लिखिए।

सूँघने से पेट नहीं भरता, वैसे ही बिना कथ्य के कहानी नहीं बनती: यही व्यंग्य है।

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