मन्नू भंडारी — एक कहानी यह भी
पिता: व्यक्तित्व और प्रभाव
लेखिका के पिता के व्यक्तित्व और उनके प्रभाव को समझाना।
लेखिका. मन्नू भंडारी सन् 1931 में मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव (ज़िला मंदसौर) में पैदा हुईं; इंटर तक पढ़ाई अजमेर में हुई; बाद में दिल्ली के मिरांडा हाउस में पढ़ाया। सन् 2021 में उनका देहांत हुआ। रचनाएँ: कहानी-संग्रह 'एक प्लेट सैलाब', 'मैं हार गई', 'यही सच है', 'त्रिशंकु'; उपन्यास आपका बंटी, महाभोज।
आत्मकथ्य, आत्मकथा नहीं. उन्होंने अपनी पूरी जीवन-कहानी क्रम से नहीं लिखी; उन लोगों और घटनाओं के बारे में लिखा जिन्होंने उन्हें लेखिका बनाया। यह पाठ दो लोगों पर टिका है: उनके पिता और कॉलेज की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल।
घर. लेखिका की यादों का पहला घर: अजमेर, मोहल्ला ब्रह्मपुरी, एक दो-मंज़िला मकान। ऊपर पिता जी का 'साम्राज्य' था: चारों ओर बिखरी किताबें, पत्रिकाएँ, अख़बार; वे या तो पढ़ते रहते या डिक्टेशन देते। नीचे माँ और हम भाई-बहन।
इंदौर के दिन. अजमेर आने से पहले परिवार इंदौर में रहता था, जहाँ पिता जी की बड़ी इज़्ज़त थी। वे कांग्रेस और समाज-सुधार के काम से जुड़े थे, आठ-दस विद्यार्थियों को घर रखकर पढ़ाते थे, बहुत दरियादिल थे। पर साथ ही बहुत क्रोधी और अहंवादी (घमंडी) भी।
टूटते पिता. एक बड़े आर्थिक झटके के बाद वे अजमेर आए और अकेले दम पर अंग्रेज़ी-हिंदी विषयवार शब्दकोश का अधूरा काम आगे बढ़ाया, अपनी तरह का पहला। इससे यश मिला, पैसा नहीं। गिरती हालत और अपनों के धोखे ने उन्हें और क्रोधी और शक्की बना दिया।
गोरी बहन से तुलना. पिता जी को गोरा रंग बहुत पसंद था। लेखिका काली, दुबली, मरियल थीं; उनसे दो साल बड़ी बहन सुशीला गोरी, स्वस्थ, हँसमुख। हर बात में तुलना और सुशीला की तारीफ़ से लेखिका के मन में गहरी हीन-भावना बैठ गई। आज नाम और सम्मान पाकर भी उन्हें अपनी उपलब्धियाँ तुक्का लगती हैं।
पिता की छाया. बड़ी होकर लेखिका ने पाया कि पिता के कई रूप (उनकी कुंठाएँ, उनका शक, उनकी प्रतिक्रियाएँ) उनके भीतर भी चले आए हैं। जिनसे हम लड़ते हैं, वे भी हमें गढ़ते हैं।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.