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मातृभूमि

कविता: मातृभूमि

सोहनलाल द्विवेदी की कविता 'मातृभूमि' पढ़ो और देखो कि कवि अपनी धरती को कैसे याद करते हैं।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 1 खोलो और पाठ 1 की कविता 'मातृभूमि' पढ़ो। कविता पृष्ठ 2 तक चलती है। इसे सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा है।

पहले नाम को ठीक से बोलना सीखो: 'मातृ' में 'ऋ' की मात्रा है, इसलिए इसे 'मात्-री' जैसा बोलते हैं, 'मातर' नहीं। 'मातृ' का अर्थ है माता, इसलिए 'मातृभूमि' का अर्थ है — वह भूमि जो माँ के समान है। जैसे माँ हमें पालती है, वैसे ही धरती हमें अन्न, पानी और घर देती है। इस कविता में कवि अपने देश भारत को अपनी मातृभूमि कहता है।

कविता की शुरुआत पहाड़ और समुद्र से होती है। ऊँचा हिमालय खड़ा है और ऐसा लगता है मानो वह आकाश को चूम रहा हो। पहाड़ सच में आकाश को नहीं छूता; नीचे से देखने पर ऐसा लगता है कि पहाड़ और आकाश मिल गए हैं। नीचे, चरणों के तले झुककर, सिंधु रोज़ झूमता रहता है। यहाँ 'सिंधु' का अर्थ है समुद्र — यानी हिंद महासागर। ऊपर पहाड़, नीचे समुद्र: मानो पूरा देश एक तस्वीर में आ गया।

फिर कवि नदियों की बात करता है। गंगा, यमुना और त्रिवेणी नदियों में लहरें उठ रही हैं। 'त्रि' का अर्थ है तीन और 'वेणी' का अर्थ है धारा; प्रयागराज में जहाँ तीन नदियाँ मिलती हैं, उस संगम को त्रिवेणी कहते हैं। इन नदियों की जगमगाती, निराली छटा (सुंदरता) हर कदम पर बिखरी हुई है।

इस भूमि की पहाड़ियों में अनेक झरने झरते हैं, और झाड़ियों में चिड़ियाँ मस्त होकर चहकती हैं। पृष्ठ 2 पर कवि बताता है कि यहाँ आम के घने बाग हैं, जिन्हें 'अमराइयाँ' कहते हैं। उनमें कोयल पुकारती है। यहाँ मलय पवन बहती है — दक्षिण के मलय पर्वत से आने वाली ठंडी, सुगंधित हवा — जो तन और मन दोनों को सँवार देती है।

बीच-बीच में कवि बार-बार कहता है कि यह भूमि मेरी है — मेरी पुण्य-भूमि (पवित्र भूमि), स्वर्ण-भूमि, जन्मभूमि और मातृभूमि। भारत को पुराने समय में 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था; 'स्वर्ण-भूमि' उसी की याद दिलाता है। प्रकृति का वर्णन हो या महापुरुषों का, कवि पूरी कविता में एक ही काम करता है: वह भारत की प्रशंसा करता है।

पहाड़, समुद्र, नदियाँ, बाग — हर चीज़ गिनाकर कवि एक ही बात कहता है: यह भूमि मेरी है।

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