मातृभूमि
कवि सोहनलाल द्विवेदी
कवि सोहनलाल द्विवेदी के जीवन के बारे में जानो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 3 खोलो और 'कवि से परिचय' पढ़ो। कविता 'मातृभूमि' हिंदी के प्रसिद्ध कवियों में से एक, सोहनलाल द्विवेदी जी ने लिखी है। किताब में उनके नाम के साथ दो वर्ष लिखे हैं: 1906–1988।
जब उनका जन्म हुआ, उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य था — यानी अंग्रेज़ भारत पर राज करते थे। उस समय कुछ लोग आज़ादी के लिए आंदोलन करते थे, और कवि-लेखक अपनी लेखनी से लड़ते थे। 'लेखनी' का अर्थ है कलम: सोहनलाल द्विवेदी ने लिखकर लोगों में हिम्मत और देशप्रेम जगाया और अंग्रेज़ी राज का विरोध किया।
उनकी लेखनी का सबसे प्रिय विषय था 'देशभक्ति'। भारत के गौरव का गान करना उन्हें बहुत प्रिय था — इसीलिए 'मातृभूमि' में वे भारत की इतनी प्रशंसा करते हैं।
किताब उनकी दो और चर्चित रचनाओं के नाम बताती है: 'बढ़े चलो, बढ़े चलो' और 'कोशिश करने वालों की हार नहीं होती'। दूसरी रचना की यह पंक्ति तुमने शायद सुनी हो: 'लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।' इसका अर्थ है — डरकर रुक जाने से कुछ नहीं मिलता; जो कोशिश करता रहता है, वह हारता नहीं।
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