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गोल

संस्मरण: गोल

मेजर ध्यानचंद का संस्मरण 'गोल' पढ़ो।

यह पाठ आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 2 'गोल' (पृष्ठ 13) से है। नाम पढ़कर शायद गोल गेंद, गोल रोटी या गोल चाँद याद आए; पर यहाँ 'गोल' का मतलब है खेल का गोल — जब गेंद गोल-पोस्ट में जाती है।

यह एक संस्मरण है। 'स्मरण' का अर्थ है याद करना, इसलिए संस्मरण यानी लेखक की अपनी यादें, उसके साथ सच में हुई घटनाएँ। इसे हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद ने लिखा है, और वे अपनी ही एक घटना सुना रहे हैं। इसे यहाँ छोटे में पढ़ो।

ध्यानचंद बताते हैं कि खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक (हल्की-फुल्की बहस) तो होती ही रहती है। सन् 1933 की बात है। उन दिनों वे पंजाब रेजिमेंट (सेना का एक दल) की ओर से खेलते थे। एक दिन पंजाब रेजिमेंट और सैंपर्स एंड माइनर्स टीम के बीच मुकाबला था। माइनर्स टीम के खिलाड़ी उनसे गेंद छीनने की बहुत कोशिश करते, पर हर बार नाकाम रहते।

तभी माइनर्स टीम के एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर अपनी हॉकी स्टिक ध्यानचंद के सिर पर मार दी। उन्हें मैदान से बाहर ले जाना पड़ा। थोड़ी देर बाद वे सिर पर पट्टी बाँधकर फिर मैदान में लौट आए। उन्होंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखा और कहा कि वह चिंता न करे — इसका बदला वे ज़रूर लेंगे।

यह सुनकर वह खिलाड़ी घबरा गया। अब वह हर समय ध्यानचंद को ही देखता रहता कि कब वे उसके सिर पर स्टिक मारेंगे। उसका ध्यान खेल से हट गया, पर ध्यानचंद का पूरा ध्यान खेल पर था।

ध्यानचंद ने किसी को स्टिक नहीं मारी। उन्होंने एक के बाद एक, झटपट छह गोल कर दिए! खेल खत्म होने पर उन्होंने उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और प्यार से समझाया कि खेल में इतना गुस्सा ठीक नहीं होता, और उनका बदला तो पूरा हो चुका है। फिर बोले कि अगर वह उन्हें स्टिक न मारता, तो शायद वे उसकी टीम को केवल दो ही गोल से हराते। यह सुनकर वह खिलाड़ी सचमुच बहुत शर्मिंदा हुआ।

ध्यानचंद ने 'बदला' कहा, पर स्टिक नहीं उठाई — उनका बदला गोल थे।

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