गोल
बदले की सीख
जानो कि मैदान पर हुई एक घटना से ध्यानचंद ने बदला लेने का कौन-सा तरीका सीखा।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 13 खोलो और पाठ 2 'गोल' की घटना फिर से याद करो। सन् 1933 के एक मैच में एक खिलाड़ी ने गुस्से में ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मार दी थी। ध्यानचंद ने कहा था कि वे बदला ज़रूर लेंगे — और फिर उन्होंने झटपट छह गोल कर दिए।
ध्यानचंद का बदला चोट का बदला चोट से नहीं था। उन्होंने अपना बदला अच्छा खेलकर, गोल करके लिया। खेल के बाद उन्होंने उस खिलाड़ी को 'दोस्त' कहकर समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं होता। इससे पता चलता है कि ध्यानचंद जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए — गुस्से या बदले की भावना से नहीं।
पाठ में एक और बात ध्यान देने की है। जब ध्यानचंद ने बदले की बात कही, तो वह खिलाड़ी घबरा गया। उसने खुद बुरा काम किया था, इसलिए उसे डर था कि उसके साथ भी वैसा ही होगा। वह पूरे मैच में डर के मारे ध्यानचंद को ही देखता रहा, और अपना खेल भूल गया। उसके गुस्से ने उसकी टीम को ही नुकसान पहुँचाया।
इसीलिए ध्यानचंद कहते हैं: बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी। यही इस संस्मरण की सीख है। किताब पृष्ठ 17 पर इसी बात पर चर्चा करने को कहती है।
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