गोल
मेजर ध्यानचंद का जीवन
मेजर ध्यानचंद के जीवन के बारे में जानो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 14 खोलो। पाठ 'गोल' में मेजर ध्यानचंद अपने जीवन के बारे में भी बताते हैं, और पृष्ठ 16 पर 'लेखक से परिचय' में उनके बारे में और जानकारी है। किताब में उनके नाम के साथ ये वर्ष लिखे हैं: 1905–1979।
ध्यानचंद का जन्म सन् 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में उनका परिवार झाँसी आकर बस गया। 16 साल की उम्र में वे 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट' में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गए। उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का राज था, और सेना में भारतीय सैनिकों के अलग-अलग दल होते थे जिन्हें रेजिमेंट कहते थे।
उनकी रेजिमेंट का हॉकी में काफ़ी नाम था, पर शुरू में ध्यानचंद की खेल में कोई दिलचस्पी (रुचि) नहीं थी। उस समय रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे, जो उन्हें बार-बार हॉकी खेलने को कहते थे। सूबेदार मेजर उस समय भारतीय सैनिकों का सबसे ऊँचा पद था।
छावनी (जहाँ सैनिक रहते हैं) में खेलने का कोई तय समय नहीं था — सैनिक जब चाहते, मैदान में पहुँचकर अभ्यास करने लगते। तब तक ध्यानचंद एक नौसिखिया (नया-नया सीखने वाला) खिलाड़ी थे।
जैसे-जैसे उनके खेल में निखार आया (वे और अच्छा खेलने लगे), उन्हें तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में उन्हें भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया, और वहाँ भारत को स्वर्ण पदक मिला। उस समय वे सेना में लांस नायक थे — सिपाही से बस एक पद ऊपर।
ध्यानचंद इतने महान खिलाड़ी थे कि भारत उनके जन्मदिन को 'राष्ट्रीय खेल दिवस' के रूप में मनाता है, ताकि लाखों लोग उनके जीवन से प्रेरणा ले सकें। भारत का सबसे बड़ा खेल पुरस्कार 'खेल रत्न' भी उनके नाम पर दिया जाता है।
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