LearnWave
Learn it. Master it.

गोल

हॉकी के जादूगर

जानो कि ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर क्यों कहा जाता है।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 14 खोलो। मेजर ध्यानचंद बताते हैं कि आज वे जहाँ भी जाते हैं, बच्चे और बूढ़े उन्हें घेर लेते हैं और उनकी सफलता का राज़ पूछते हैं। वे कहते हैं कि उनके पास कोई गुरु-मंत्र (जादुई तरीका) नहीं है; वे सबसे यही कहते हैं कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।

इन तीन शब्दों को समझो।

  • लगन यानी पूरे मन से, बिना थके किसी काम में जुटे रहना।
  • साधना यानी अपने लक्ष्य के लिए लगातार अभ्यास करना।
  • खेल भावना यानी खेल को ईमानदारी से, टीम के साथ मिलकर और बिना गुस्से के खेलना।

सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक में लोग ध्यानचंद के हॉकी खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहने लगे। यानी यह नाम उन्हें उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण मिला। गेंद उनकी स्टिक से ऐसे चिपकी रहती थी मानो जादू हो।

पर ध्यानचंद कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि सारे गोल वे ही करते थे। उनकी हमेशा कोशिश रहती कि वे गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दें, ताकि गोल करने का श्रेय (तारीफ़ और नाम) साथी को मिले। मेहनत वे करते, नाम साथी का होता। इसी खेल भावना से उन्होंने दुनिया भर के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।

खेलते समय वे हमेशा ध्यान रखते थे कि हार या जीत उनकी अपनी नहीं, बल्कि पूरे देश की है। इसलिए वे अपने लिए नहीं, देश के लिए खेलते थे।

जादूगर कहलाने वाला खिलाड़ी गोल का श्रेय खुद नहीं, साथी को देना चाहता था।

Practise this lesson

Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.

No account, no email address. Opens the real product.