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परीक्षा

कहानी: परीक्षा

प्रेमचंद की कहानी 'परीक्षा' शुरू करो।

यह कहानी आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 10 'परीक्षा' की है, जिसे प्रेमचंद ने लिखा है। प्रेमचंद को हिंदी का 'कथा-सम्राट' (कहानियों का राजा) कहा जाता है; उनका असली नाम धनपत राय था। इस पाठ में हम कहानी का आरंभ पढ़ेंगे — एक समस्या, और उसका हल।

पहले दो पुराने शब्द समझ लो। रियासत — पुराने समय का एक छोटा राज्य, जिस पर एक राजा (महाराज) राज करता था। दीवान — राजा का सबसे बड़ा मंत्री, जो राज-काज सँभालने में राजा की मदद करता था।

देवगढ़ नाम की एक रियासत थी। उसके दीवान थे सरदार सुजानसिंह। उन्होंने चालीस साल तक महाराज की सेवा की थी। अब वे बूढ़े हो गए थे। एक दिन वे महाराज के पास गए और विनती की कि अब उनकी अवस्था ढल गई है और राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं रही।

उन्होंने एक डर भी बताया: अगर बुढ़ापे में उनसे कोई भूल-चूक हो गई, तो सारी ज़िंदगी की नेकनामी (अच्छा नाम) मिट्टी में मिल जाएगी। चालीस साल में कमाया अच्छा नाम एक गलती से खो सकता था — इसलिए वे अब काम छोड़ना चाहते थे।

महाराज अपने अनुभवी और नीतिकुशल (राज चलाने की समझ रखने वाले) दीवान का बड़ा आदर करते थे। उन्होंने सुजानसिंह को बहुत समझाया कि वे काम न छोड़ें। पर दीवान साहब नहीं माने।

आखिर महाराज ने हारकर उनकी प्रार्थना मान ली — पर एक शर्त लगा दी: रियासत के लिए नया दीवान सुजानसिंह को ही खोजना पड़ेगा। महाराज को भरोसा था कि उनका समझदार दीवान ही सही आदमी चुन सकता है। यहीं से कहानी की 'परीक्षा' शुरू होती है।

चालीस साल का अच्छा नाम बचाने के लिए दीवान ने खुद ही कुर्सी छोड़नी चाही।

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