परीक्षा
उम्मीदवारों का दिखावा
देखो कि उम्मीदवार अपने को अच्छा दिखाने के लिए कैसा दिखावा करते हैं।
यह बात आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 10 'परीक्षा' (प्रेमचंद) के दूसरे भाग की है। दीवान के पद का विज्ञापन निकलते ही सारे मुल्क में तहलका मच गया। इतना ऊँचा पद, और कोई डिग्री की शर्त नहीं! सैकड़ों लोग अपना-अपना भाग्य आज़माने देवगढ़ चल पड़े।
हर रेलगाड़ी से उम्मीदवारों का मेला-सा उतरता। कोई पंजाब से आया, कोई मद्रास से; कोई नए फ़ैशन का शौकीन, कोई पुरानी सादगी वाला। रंग-बिरंगी पगड़ियाँ और तरह-तरह के कपड़े दिखने लगे। पर सबसे ज़्यादा संख्या ग्रेजुएटों की थी।
सुजानसिंह ने इन सबके आदर-सत्कार का अच्छा प्रबंध किया। अब हर उम्मीदवार अपने को अच्छा दिखाने में लग गया। मिस्टर 'अ' पहले दिन में नौ बजे तक सोते थे; अब वे सुबह-सुबह बगीचे में टहलते हुए दिखते। मिस्टर 'द', 'स' और 'ज' से उनके नौकर परेशान रहते थे; अब वे 'आप' और 'जनाब' कहे बिना नौकरों से बात ही नहीं करते। मिस्टर 'ल' को किताबों से घृणा थी; अब वे बड़े-बड़े ग्रंथों में डूबे रहते। जिससे बात करो, वही नम्रता और अच्छे व्यवहार का देवता लगता।
पर यह सब सच्चा बदलाव नहीं था, दिखावा था। लोग सोचते थे कि एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें — बस नौकरी मिल जाए, फिर कौन पूछता है!
और उधर, मनुष्यों को परखने वाला वह 'बूढ़ा जौहरी' — सरदार सुजानसिंह — छिपकर सब देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा है। यहाँ 'बगुले' हैं दिखावा करने वाले उम्मीदवार, और 'हंस' है वह सच्चा गुणी आदमी जिसे वे खोज रहे थे। जौहरी वह होता है जो हीरे-मोती परखकर बताता है कि कौन-सा असली है और कौन-सा नकली। बगुले और हंस दोनों सफ़ेद होते हैं, दूर से एक जैसे दिखते हैं — इसलिए बगुलों के झुंड में हंस पहचानना कठिन है। सुजानसिंह को भी दिखावे की भीड़ में सच्चा आदमी पहचानना था।
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