चेतक की वीरता
कविता: चेतक की वीरता
श्यामनारायण पाण्डेय की कविता 'चेतक की वीरता' पढ़ो और महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक से मिलो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 122 खोलो और पाठ 11 की कविता 'चेतक की वीरता' पढ़ो। कविता पृष्ठ 123 तक चलती है। इसे श्यामनारायण पाण्डेय ने लिखा है, और यह उनकी बड़ी काव्य-रचना 'हल्दीघाटी' का एक अंश (हिस्सा) है। 'हल्दीघाटी' एक महाकाव्य है — कविता में कही गई एक पूरी लंबी कथा — जो हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में है। यह युद्ध मेवाड़ के महाराणा प्रताप और मुग़ल बादशाह अकबर की सेना के बीच हुआ था।
चेतक राणा प्रताप का घोड़ा था। यह वीर रस की कविता है — ऐसी कविता जिसे पढ़कर मन में जोश और साहस जाग उठे। इसमें कवि बढ़ा-चढ़ाकर, बहुत जोश से चेतक की फुर्ती और बहादुरी का चित्र बनाता है। इसे ज़ोर से, जोश के साथ पढ़कर देखो!
कवि कहता है कि रण (युद्ध) के बीच चौकड़ी भरता हुआ चेतक सबसे निराला बन गया। चौकड़ी भरना यानी हिरन की तरह चारों पैरों से उछल-उछलकर दौड़ना। वह इतना तेज़ दौड़ता था कि मानो हवा से उसकी होड़ लगी हो।
राणा प्रताप का कोड़ा (घोड़े को हाँकने का चाबुक) कभी चेतक के शरीर पर नहीं गिरता था — उसे मारकर दौड़ाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। कवि की कल्पना है कि चेतक शत्रुओं के सिरों के ऊपर से ऐसे दौड़ता था, मानो वह आसमान पर दौड़ रहा हो।
लगाम ज़रा-सी हिलती, तो चेतक अपने सवार — महाराणा प्रताप — को लेकर उड़ चलता। राणा की आँख की पुतली घूमने से पहले ही चेतक उस ओर मुड़ जाता — यानी वह अपने सवार का मन पहले ही समझ लेता। वह निडर होकर भयानक भालों, ढालों और तलवारों के बीच से सरपट दौड़ा। पल में यहाँ, पल में वहाँ — ऐसा लगता था कि कोई जगह नहीं बची जहाँ वह न हो।
पृष्ठ 123 पर कवि कहता है कि बढ़ती नदी की तरह वह लहराया, आगे गया और फिर ठहर गया। फिर वह शत्रु की सेना पर एक भयंकर, कठोर बादल की तरह टूट पड़ा — जैसे बादल से वज्र (बिजली) गिरता है। शत्रुओं के भाले गिर गए, तरकश गिर गए, घोड़े की टापों से अंग घायल हो गए। घोड़े का ऐसा रंग (रूप) देखकर सारा वैरी-समाज (शत्रुओं का दल) दंग रह गया।
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