हिंद महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान
सिंह और हिरन
पढ़ो कि नेशनल पार्क में लेखक ने सिंह और हिरनों को कैसे देखा।
पाठ 12 में लेखक 'दिनकर' नैरोबी के नेशनल पार्क में सिंह देखने गए थे। यहाँ पढ़ो कि वहाँ क्या हुआ — यह घटना उन्हें जीवन भर याद रही।
बड़ी दूर जाकर — दस-बीस मील की हर सड़क छान लेने के बाद — वे उस जगह पहुँचे जहाँ उस दिन सिंह आराम कर रहे थे। वहाँ कोई सात-आठ सिंह लेटे या सोए हुए थे, और उन्हें घेरकर आठ-दस मोटरें खड़ी थीं।
मज़े की बात — लेखक के शब्दों में 'तुर्रा यह कि' — यह थी कि सिंहों को इसकी कोई परवाह ही नहीं थी कि उन्हें देखने कौन आया है। उन्होंने मोटरों में बैठे लोगों की ओर दृष्टिपात तक नहीं किया, यानी एक नज़र भी नहीं डाली। लेखक वहाँ लगभग आधा घंटा रुके। इस बीच एक सिंह ने उठकर जम्हाई ली, दूसरे ने अपना शरीर ताना, पर किसी ने उनकी ओर नज़र नहीं उठाई। लेखक हँसकर लिखते हैं कि सिंहों ने उन्हें पेड़-पौधों और खरपात (घास-फूस) से भी बदतर समझा।
तभी कोई मील भर दूर हिरनों का एक झुंड दिखा, और उनके बीच एक जिराफ़ खड़ा था। अब दो जवान सिंह उठे। एक थोड़ा आगे जाकर बैठ गया, और दूसरा घास के बीच छिपता हुआ आगे बढ़ने लगा। हिरनों ने ताड़ लिया (भाँप लिया) कि सिंहों की नज़र उन पर है। वे चरना भूलकर चौकन्ने हो गए। कुछ हिरन झुंड से छूटकर भाग निकले, पर बाकी हिरन जहाँ थे वहीं एक गोल में ठिठककर खड़े रहे।
बाकी हिरन भागे क्यों नहीं? लेखक के अनुसार सिंह सूर्यास्त के बाद शिकार करते हैं, और वे पूरे झुंड का शिकार नहीं करते, बल्कि उस जानवर का करते हैं जो भागते हुए झुंड से पिछड़ जाता है। इसलिए हिरनों के लिए भागना निरापद (सुरक्षित) नहीं था — भागने पर उन्हें सिंह के हमले का डर था। यह सब देखकर लेखक को लगा कि उनका रक्तचाप बढ़ रहा है, और उन्होंने तय किया कि अब लौट चलना चाहिए।
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