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पेड़ की बात

बीज से अंकुर

जगदीशचंद्र बसु का लेख 'पेड़ की बात' पढ़ो और जानो कि बीज से अंकुर कैसे निकलता है।

यह पाठ आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 13 'पेड़ की बात' से है। इसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु ने बांग्ला में लिखा था, और शंकर सेन ने इसका हिंदी में अनुवाद किया। यह एक लेख (निबंध) है, जिसमें लेखक बीज से पेड़ बनने की कहानी सुनाते हैं। जगदीशचंद्र बसु वही वैज्ञानिक हैं जिन्होंने पेड़-पौधों के जीवन पर बहुत खोज की — इसलिए यह लेख उनके जन्म से लेकर उनके अंत तक की 'पेड़ की बात' है।

लेख में, बहुत दिनों तक बीज मिट्टी के नीचे पड़े रहे। महीने पर महीने बीतते गए। सर्दियों के बाद वसंत आया। फिर वर्षा की शुरुआत में दो-एक दिन पानी बरसा। लेखक कहते हैं, मानो बाहर से कोई पुकार रहा हो — अब और मत सोओ, ऊपर उठो, सूरज की रोशनी देखो!

धीरे-धीरे बीज का ढक्कन दरक गया, यानी बीज के दोनों दलों में दरार आ गई। दो सुकोमल (बहुत कोमल) पत्तियों के बीच से अंकुर बाहर निकला। अंकुर का एक अंश नीचे मिट्टी में मज़बूती से गड़ गया, और दूसरा अंश मिट्टी को भेदकर ऊपर की ओर उठा — जैसे कोई शिशु अपना नन्हा-सा सिर उठाकर हैरानी से नई दुनिया देख रहा हो।

अंकुर का जो अंश मिट्टी के भीतर जाता है, उसका नाम जड़ है। जो अंश ऊपर की ओर बढ़ता है, उसे तना कहते हैं। लेख के अनुसार सभी पेड़-पौधों में ये दो भाग — जड़ और तना — मिलते हैं।

तुमने भी शायद यह देखा हो: गर्मियों में आम खाकर गुठली कहीं फेंक दी, और बारिश के बाद उसी गुठली से एक छोटा-सा पौधा निकल आया। वही अंकुर है।

बारिश की पुकार पर बीज जागता है — एक हिस्सा नीचे जड़ बनता है, दूसरा ऊपर तना।

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